Home / About

सफलता आपको प्रेरणा नहीं देती बल्कि सफलता के लिए शंघर्ष से आपको प्रेरणा मिलती है

निस्वार्थ प्रेम

निस्वार्थ प्रेम सेवा संसार की सबसे बड़ी ताकत जो दुनिया की हर बुरी ताकत को कमजोर कर देती हेै। सेवा का संचार हर इंसान के अन्दर होता है। मनुश्य अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाने के लिए हर इंसान की सेवा नहीं कर पाता, इसलिए वह सिर्फ अपने बारे में सोचकर आगे निकल जाता है। कुछ लोग होते हेैं। जो सेवा का संकल्प लेते हुये, जिन्दगी की परेषानियों से जीतकर बहुत आगे निकल जाते है।

जीत का मंजर लेकर हारकर चलना तो इनकी आदत होती है, अंत में जीत से दुनिया की तकदीर अपने हाथों लिखने एक लम्बे काफिले के साथ चलकर, ईष्वर षक्ति का हिस्सा बन जाते हैं, संघर्श और हिम्मत के बिना सेवा का सरोकार हासिल करना हर किसी के बस की बात नहीं,लेकिन जो सेवा को ईष्वरीय षक्ति मान लेते है।परेषानी को दूर करने में त्याग और तपस्या के नायक बन जाते है।सेवक हमेषा मुसीबतों को गले लगाकर बड़ी से बड़ी समस्या को हल करने में कामयाब हो जाता हेै।यही सच्चा ईष्वर प्रेम है,जो सदा हमारे दुखों मेें साथ देेता है।कुछ इसी तरह बेबस जिन्दगी मुझे भी मिली,लाख परेषानियां आयी,लेकिन कैंसे दूर हो गयी पता ही नहीं चला, एक पल के लिए भगवान पर भरोसा करके चली,तो तपस्या से भरा जीवन आंखों में आंॅसू देकर संघर्श करने के लिए ललक उठता,अब तो कोई भी परेषानी दे,तो हंॅंसकर हल करने को उतारू हो जाती हूॅं,क्योंकि मैं जानती हॅू।ंजो मिला है वो देना भी होगा,लेकिन जाते-जाते कुछ इंसानियत के फर्ज और ईष्वर के दिये मानवतावादी जीवन का कर्ज भी अदा करना होगा।अब लगता है,जितना भी समय मिले सेवा में लगा दूॅं,फिर चाहे ये सांसे भी बन्द हो जाये, रिस्ते नाते सब यही के यही छोड़कर जाना हैं।मोहमाया के इस जाल से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता है,इंसानियत की सेवा जिसमें सब एक से नजर आते हैं,हर पराया इंसान अपना लगता चाहे वह किसी धर्म,जाति का क्यों ना हो,हमारी मानवता उनको अपना समझकर संगठित होकर सहायता करने का प्रयास करती है।मानव सेवा परम धर्म से सम्बन्धित सेवा के साक्षी निस्वार्थ पे्रम पर आधारित मेरी यह कहानी मुझे हमेषा सेवा की याद दिलाती रहेगी।और मेैं इन घटनाओं से सीख लेकर आगे निकलती रहॅूूंगी।आज मनुश्यसेवा एक दिखावे तक सीमित रह गयी है।लेकिन मुझे लगता है, इंसान की वास्तविक सेवा उसके षारीरिक और मानसिक दर्द को दूर करना होती है।यदि षरीर स्वस्थ्य है,तो इंसान खुष और सुरक्षित है।यदि षरीर स्वस्थय नहीं हेै,तो हर परेषानी कठिन लगने लगती है। इसीलिये मेरी यह सेवा की साक्षी कहानी मेरे जीवन की अनमोल यादें देती रहेगी कि जिन्दगी भर मैंने क्या हासिल किया, और क्या हासिल करना चाहिये था।सेवा मेरे जीवन का वो सुख है जो हमेषा मेरे साथ चलेगा।मुझे याद दिलाता रहेगा कि मेैंने क्या खोया, या क्या पाया त्याग और तपस्या के बिना सेवा की कल्पना करना असंभव है।यह में भली भांति जानती हॅंू।जेैसे हवा के बिना सांसे ,पानी के बिना जिन्दगी ऐंसे ही सेवा के बिना मोक्ष नहीं मिलता।मेरी दौलत मेरी सेवा हैं ,इससे बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं जिन्दगी का हर पन्ना पलट लॅूं, मेरी आत्मा प्रेम में जाकर ठहरेगी।हर इंसान की आत्मा गवाही देती है,सेवा के बिना इंसानियत का रिस्ता कुछ भी नहीं यही परमार्थ और सेवार्थ है।जो जन्म मरण से हमको बचाता हेै। कमला बिश्ट अरोरा पारिवारिक और सामाजिक नाम (गंुजन अरोरा) पिता का नाम-स्0 श्री हीरा सिंह बिश्ट उत्तराखण्ड राज्य सक्रिय आंदोलनकारी माता श्रीमती माधवी बिश्ट ग्राम ढंुगा जिला-पिथौरागढ़ में पली पढ़ी, बचपन से सेवा के लिए जिन्दगी समर्पित कर दी, संघर्शों के बीच निकलते हुये, आज तक हर उस इंसान के दर्द में खड़ी है जिसका कोई सहारा नहीं,बचपन में फटी फ्राक में दुनिया हर दस्तूर को देखा, दुख की वह घड़ी आज तक सीने में चुभती है।


 अकेले जीवन का संधर्श मिला कोई सहयोग करने वाला नहीं,बचपन से ही सेवा की मिषाल आज तक कायम रखना हर किसी के बस की बात नहीं, जब जन्मजात की सेवक पैदा हो ता,ेऐंसे इंसान को कोई क्या नाम दे सकता है।कक्षा 1 में पड़ने वाली बिन पिता प्यार का साया 19 वर्शीय विधवा मां की माया गरीब और लाचारी की जिन्दगी जीने वाली लड़की की कहानी दर-दर की ठोकरें खाने वाली,आज समाज के लिए मानवता की सेवक बन गयी ,बचपन में गरीबी और पिता का साया सर से उठ जाने के बाद अपने आप मां के सहारे उठ खड़ी हुई,उस समय ये नहीे पता था,कि आज षाम को खाना मिलेगा भी नहीं या आंखे बन्द कर, मां के आंचल से बंध कर भूखा ही सोना होगा।जमीन के लिए ताऊ ने घर से बाहर निकलने को मजबूर कर दिया,एक झोले के कपड़े लेकर मां षहर की तरफ निकल पड़ी, 1988 में कई प्रयासों के बाद 1600 रू0 की नौकरी में बेटी को पुरी षिक्षा लेेने तक पड़ाया,सेवा के भाव को कैंसे अपने मन में रखा कोई नहीं जानता,सेवा की यह मिषाल मेरे मन में स्ंवय के संघर्शमय जीवन से मिली सुरूवाती सेवा पड़़ोस में रहने वाले बुर्जुग पति पत्नी अंधे थे,अंधी बुर्जुग महिला रिस्ते सेे अम्मा,बुबु लगते थे,उनके बच्चे रोजी,ं जैंसे-तैंसे वह खाना बनाकर खाते थे, अम्मा जब पानी भरने नल में जाती थी,तो आस-पास से षैतान बच्चे उनके सिर में रखे पतीले में पत्थर और मिट्टी डाल दिया करते थे,ऐसंे में मेरी सेवा ने उनका हाथ पकड़कर,उनका पानी अपने सिर पर रखकर उनको घर तक ले जाती थी।स्कूल से आने के बाद वह हर समय उन्हीं के साथ सेवा में जुट जाती थी।उनके बच्चे रोजी-रोटी की तलाष में दिल्ली में निवास करते थे।वह कभी-कभी अपने माता-पिता से मिलने आया करते थे।संघर्श भरे जीवन में ढाई साल में पिता का साया छूट गया खाने को राषन नहीं, बदलने को कपड़े नहीं, माॅ गांव के लोगों का काम कर मुझे पालती थी।सड़को में पड़े आवारा कुत्ते के बच्चों को बेसहारा समझ कर अपने घर ले आती मां के विरोध करने पर वह कहीं न कहीं उनके रहने का इंतजाम करती, पास-पड़ोस में रहने वाले गरीब बच्चों को अपने घर बुलाकर उनको नहलाकर उनको षिक्षा के लिए प्रेरित करना मानो मेरा रोज का काम होता था ,अपने साथ स्कूल पड़ने वाली गरीब बच्चों की फीस भी अपने पाकेट मनी से देती,रास्तों में पड़े रहने वाले लोगों को अपने टिफिन का खाना खिला देती और खुद पानी पीकर लंच करती, बचपन से ही सेवा की ज्योत मेरे मन मंे जगी जो आज तक जल रही है,मां को दुसरों की सेवा करते देख मेरे मन में भी सेवा की अलख जागने लगी,अकेले रास्तों का चयन कर विज्ञान विशय से इन्टर करने के बाद एम0एस0,एम0एस0डब्लू0,स्टैनोग्राफी ष्क्षिा के साथ-साथ सकारात्मक जीवन जीने के लिए जागरूकता का अभियान भी चलाया, आज मैं सामाजिक मुद्दो के लिए लड़ना भी मेरे प्रयासों में षामिल हो गया, एहसास किया, कि यदि आर्थिक स्थिति अच्छी हो तो सपनों को पूरा करने का मुकाम मिल ही जाता है।या फिर सहयोग अच्छा मिल तो इंसान जिन्दगी की लड़ाई में हमेषा कामयाब हो जाता हेै।दोनों ही मुझे नहीं मिले सहयोग, पैंसा,परिवार कुछ भी मेरी जिन्दगी में नहीं था।मां का प्यार और सहारा जो आज तक मेरे साथ हेै।मिली तो सिर्फ संवेदनायें जो हर इंसान की जिन्दगी को झकझोर कर देती हैं।संघर्शों के इस जीवन काल में मां कि अलावा कोई सहायता करने वाला नहीं था।कक्षा 7 में जाने लगी तो उत्तराखण्ड को अपनी पहचान बनाने वाले रिस्ते के मामा उत्तराखण्ड क्रातिंदल के षीर्श नेता श्री काषी सिंह ऐरी जी के राजनैतिक जीवन ने मेरी सोच को बदल दिया।उनके सानिध्य मे उत्तराखण्ड क्रांतिदल के विचारों से प्रेरित होकर का्रंतिकारी विचार लिखने लगी।जब भी खाली समय मिलता कवितायें,कहानी,नारे,भाशण लिखने लगती। या बुजुर्गों के साथ पुराने समय के यादों को ताजा करने के लिए उनके बीच बैठ जाती।और उनके जीवन काल की कल्पनाओं में खोकर खुद को भी उनकी तरह महसूस करती हेै।और उम्मीद करती कि काष इस समय भी ऐंसा ही होता।लेकिन नियति को बदल सकना किसी के बस में नहीं था। मां राज्य आन्दोलनकारी लड़ाई में षामिल होने जाती,तो वही दुसरी तरफ आस-पास के लोग मां को गोली लगने की बात कहकर डरा देते।मैं आंखों में आंसू लेकर रोने लगती।षाम होते ही मां की आवाज से मन खुषी से झुमने लगता।मां के आने तक घर का खाना बनाना,घर के सारे काम स्ंवय करती।उस समय स्टोव के खाना बनता था। तो तेल लेने के लिए मीलों दुर जाना होता था। तब खाना बना सकते थे।हाथ में पैंसा नहीं होता था। तो ले हम बच्चे पैदल ही बर्तन लेकर निकल पड़ते थे।और षाम तक कहीं ना कहीं से तेल लेकर घर आ जाते थे।


बचपन से है षिकायत क्यों नहीं मिली मुझे रहमत क्ी किसी तरह बडे़ मामा काषी सिंह ऐरी जी ने मम्मी को महिला डेरी में नौकरी लगा दी ,मम्मी की इसी नौकरी से मैंने अपनी षिक्षा और दीक्षा ली,और आज समाज के सामने समाज सेवक बनकर उन लोगों के लिए खड़ी हो गयी जो असहाय और निर्धनता की जिन्दगी जीकर आगे नहीं बड़ पाते, भूखे प्यासे जिन्दगी के कश्टों को झेलते हुए अपने सपनों को हकीकत नहीं कर पाते। दर-दर की मार खाते, कमजोरी और लाचारी के कारण हमेषा दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर रहते, और मेरी तरह गरीबी की मार को झेलकर सड़कों के किनारे सोने को मजबूर हो जाते ,जिनको षिक्षा का अधिकार होते हुये भी अषिक्षित रह जाते हैं।और अपनी जिन्दगी को हमेषा लाचारी मे ंगुजार देते हैं।ऐंसे लोगों के लिए आज में अपना षिक्षा और सेवा का वर्चस्व लेकर पहल कर रही हॅूं,जिससे मेरे समाज में कोई भी इंसान जिन्दगी के आगे मजबूर न हो,और षिक्षित होकर अपना सही फैसला लेते हुये, इस समाज में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके।मेरी लड़ाई हमेषा गरीबी के खिलाफ जारी रहती है। समय के साथ सब बदल जाता हैं,लेकिन सोच हमेषा एक लक्ष्य लेकर चले तो षायद सफलता आपको खुद मिलने लगती है।उत्तराखण्ड आन्दोलन की लड़ाई के समय पूर्व विधायक माननीय श्री काषी सिंह ऐरी जी के सानिध्य में मैंने यही सीखा की सेवा के साथ लोगों के अधिकारों के लिए लड़ना भी हमारी जिन्दगी में षामिल होना चाहिए।चाहे राजनीति की लड़ाई हो या सेवा की जब तक हम आवाज नहीं उठायेगें हम अपनों के लिए संघर्श नहीं कर पायेगें।इसलिए आगे बढ़ते रहो और सेवा की मषाल जलाकर इंसानियत का परचम लहराते रहो।दुनिया में आगे निकलने लगोगे तो कई दोस्त भी बनेगे दुष्मन भी बनेेगे लेकिन अच्छाईयों के साथ हमेषा ईष्वर का सहयोग मिलता है।यही सब सोचकर मेैंने सेवा की दुनिया में कदम रखा और सभी जगह महिला हो या पुरूश या बच्चे वक्त के मारे लोगों का सहयोग करती रही।जब इन्टर पास किया तो उस समय बड़ा भाई राजू ऐरी,अषोक भण्डारी दा,जीवन दा के साथ मिलकर चम्पावत जिले के हर स्कूल में जाकर बच्चों के लिए साहसिक पर्वतारोहण का अभियान चलाया और 500 से अधिक बच्चों को पर्वतारोहण प्रषिक्षण के जरिये धरती की सुन्दरता और सदुपयोग हेतु,तेैयार किया,जिसमें बच्चों को पर्यावरण की जानकारी और राॅेकक्लाइंमिग,जुमारिंग,रिवरका्रंिसग,पैराग्लाडिंग के जरीये आगे बड़ना सिखाया,जिससे बच्चे जिन्दगी को खुषी और खेल के साथ गुजार सकंें,तनावमुक्त रहने का प्रयास करें। स्कूल की तरफ जाने का प्रयास कर सकंे।


पैराग्लाइडिंग बच्चोें का मनोरंजन आज ये सारे बच्चे किसी न किसी मुकाम में पहुच गये हैं। यही सब बातें मुझे प्रेरित करती हेंैं कि सेवा से किसी की जिन्दगी बदल सकती है तो बदलने का प्रयास जारी हो जाना चाहिए, आज मानव सेवा ही मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म हेैं। उस समय माता-पिता बेटियों को आसानी से हमारे साथ भेज देते थे, लेकिन आज वक्त बदल गया है,स्कूली षिक्षा के साथ-साथ मेैंने बेटी जागरूकता अभियान की सुरूवात की ओेर बेटी षिक्षा के लिए साक्षरता अभियान के साथ-साथ उनको आगे बढ़ने का प्रषिक्षण देने का प्रयास भी किया,बस इस तरह मेैं हमेषा कुछ न कुछ सामाजिक कार्यों में सहयोग करती थीं।जिससे मुझे हर दिन की सीख मिलती रही। उत्तराखण्ड की पावन धरती पर सौन्दर्य भरा वातावरण दिखाने कि लिए बच्चों को पहाड़ीयों में ले जाने का प्रयास करते थे। जिससे वह प्राकृतिक से जुड़े रहें और अपने सुनहरे भविश्य की तलाष में अपने देष से भी लगाव रखते रहें।


साहसिक पर्वतारोहण अभियान सारे बच्चों को रोज इस खुसी का इन्तजार रहता था कि कब हम खतरों के खेलों से रूबरू होंगे और कब हमको पहाड़ी में जाने का मौका मिलेगा।हर दिन नया खेल और नई सीख मिलती थी।और एक दुसरे के सहयोग से पहाड़ियों में चढ़ने का षौक पालते थे।इनके साहस को देखकर लगता था कि हिम्मत नहीं हारनी चाहिये।


सर्व षिक्षा अभियान के तहत स्कूली बच्चों का ज्ञान परीक्षण बी0ए0 राजकीय पालीटैक्निक का कोर्स करने के बाद हिमालयन संस्था में टैªनिंग कोओर्डिनेटर के पद पर रहकर बिना वेतन के निःषुल्क साक्षरता अभियान में बच्चों को गांवों की महिलाओं को जागरूक एंव साक्षरता के लिए जागरूक कराने का प्रयास किया ,जिसमें मेरे साथी लक्ष्मी, किरन और स्कूलों के प्रधानाचार्या/प्रधानाचार्य आदि सभी लोगों का सहयोग रहा,जिसमें हम लोगों ने हर स्कूल में सामान्य ज्ञान परीक्षण कराया,जिससे समाज में हर बच्चा षिक्षा के लिए समाज में अपना योगदान दे सके।प्राचीनकाल से देवों की कथायें इंसानित का संदेष देते आये हेंै।कोई इसंानियत के रूप में करता है।तो कोई जानवर तो कोई फरिषता बन कर जिंदगी की तलाष कर को जिन्दगी देने का काम करता है।कोई छुपकर सेवा करता ह,ैतो कोई दिखावा कर इसंानियत का संदेष देता हेै। दोनों रूपों में वह मानवता का फर्ज अदा करता है।सभ्यता और संस्कृति का विकास मानव सेवा ही है।हर प्राणी के अन्दर परमात्मा के रूप में निवास करने वाली आत्मा में ईष्वर का वास है।मानव धर्म का आध्यात्मिकता ओैर नैतिकता से गहरा संबन्ध है।हर इंसान सेवा का संकल्प लेता हेै।लेकिन सेवा करने के बजाय वह दान देने में अपना पुण्य समझता है।परंतु हमारी यह सेवा तब तक अधुरी है।जब तक हम स्ंवय अपने हाथों से सेवा नहीं कर लेते, संघर्शों के चलते मन में आता है कि महिलाओं के साथ अक्सर अत्याचार होता हेै।ऐंसे में समाज कीे संवेदनायें मर जाती है।जब महिलायें हिंसा का षिकार होने लगती है।यदि वह बुरी है तो समाज और उसको बुरा बना देता है।यदि वह समाज निर्माण में सहयोग करे तो उसे और बदनाम करने की साजिष की जाती है।जब भी पुरे जीवन की तस्वीर सामने आने लगती है।तो मन में कुंठा होने लगती है।ये सब देखकर मन में क्रांतिकारी विचारों का आना संभव है,अक्सर देखा गया कि सदियों से हमारे देष भारत में बेटियों को कभी लक्ष्मी तो कभी दुर्गा का रूप माना जाता है जिसके घर मंे प्रवेष करने से संसार के सारे सुख आ जाते है।पूरा समाज घर,परिवार खुषियों से भर जाता है।लेकिन वर्तमान म सामाजिक कुरूतियों के चलते सारा बोझ बेटियों को ही उठाना पड़ता हेै।यह बात एक बेटी से बेहतर कोई नहीं जान सकता,इन सामाजिक कुरूतियों में दहेज प्रथा,अषिक्षा,भूणहत्या,अत्याचार,घरेलू हिंसा,यौनषोशण,हिंसा आदि।हालातों के चलते बेटियां कहीं सुरक्षित नहीं हैं।इस बात का गवाह सारा संसार है, कि बेटी के बिना संसार का कोई अस्तित्व नहीं है।फिर भी बेटी के साथ समाज हमेषा से भेदभाव करता आया है।यही कहानी है एक जनसेवक के रूप में एक गरीब लड़की की जो तमाम संघर्शों के बाद सेवा को अपनी जिन्दगी में षामिल कर मानव सेवा का संदेष समाज को दिया है। जिन्दगी की आष छोड़ चुके लोगों को नया जीवन देकर सकारात्मक जिन्दगी देने का प्रचार-प्रसार कर आज समाज में अपना नाम जन सेविका के रूप में षामिल कर दिया है।जीता जागता उदाहरण है वो तमाम लोग हैं जो आज समाज के कार्यों में अपना योगदान देकर कर रहे हैं, जिनकी जिन्दगी अंधेरों के बीच फस जाती है,और ईष्वरीय इस षक्ति का प्रयास रोषनी की ओर ले जाने का प्रयास करता है।इंसान केवल पहल करने का एक माध्यम हैं। चाहे कितनी मुसीबत आये एहसास कीजिये वह सदा हमारे साथ है,बस कुछ इस तरह सामाजिक कार्यों में सहयोग दिया जिनका वर्णन चित्रों सहित नीचे दिया गया है।


बंगाली अम्मा-बंगाली अम्मा रास्ते में सड़क के किनारे विक्षिप्त पड़ी मिली न बोल सकती थी, न कोई इषारा कर सकती थी। किसी परिचित के सहारे 108 की सहायता से अम्मा को सुषिला तिवारी अस्पताल पहुॅचाकर इमरजैंसी में भर्ती कराया, कुछ महिनों तक अस्पताल प्रषासन ने अम्मा की देखभाल की अम्मा का पैर फैक्चर था, वह बंगाली बोलती थी, कसी को उनकी भाशा समझ में नहीं आती,मैं समय-समय पर उनको मिलने जाती रही, लेकिन मेेैं अपने व्यवहार के कारण वह अस्पताल में प्रसिद्व हो गयी, अस्पताल के मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा मुझे सूचना मिली की वह अब ठीक हालत में है, अम्मा को किसी सुरक्षित स्थान में रखने की जरूरत है, लेकिन मेरे के पास अम्मा को रखने के लिए कोई इंतजाम नहीं था,पता लगा कि यदि कुछ समय और अम्मा अस्पताल में रहती तो ओैर बीमार हो जाती,उनकी जैंसी पांच लावारिष महिलायें और अस्पताल में इलाज के लिए आयी हुयी थी, जिनको मेैने वृद्वा आश्रम में भेज कर उनकी व्यवस्था करा दी।चिकित्साधिकारी पाण्डे जी द्वारा बताया गया कि हल्द्वानी मेे लावारिसों के लिए कोई षल्टर होम की व्यवस्था नहीं है, कुछ दिन तक षल्टर तलाषे लेकिन कहीं भी इनको रखने की व्यवस्था नहीं थी।


बंगाली अम्मा उन्हीं दिनों नेषनल ब्लाइन्ड स्कूल के संस्थापक श्री ष्याम सिंह धानिक जी ने एक वृद्वा आश्रम खोल रखा था, उनसे बात की तो वह रखने के लिए राजी हो गये,कुछ दिन बंगाली अम्मा वहीं रही, लेकिन वह मानसिक रूप से भी कमजोर और लाचार थी,हमारी भाशा को ना समझती थी,ना बोल सकती थी,मेेैंने मेरे किराये में रहने वाली महिला से बात की वह उ़ड़ीसा की बंगाली महिला थी, जिससे उस महिला ने भी बंगाली अम्मा से बंगाली में बात करने की कोषिष कि,अम्मा ने बताया कि उसके बहु और बेटे ने उसे गलत गाड़ी में बैठा दिया और अम्मा गलती से उत्तराखण्ड पहुच गयी,अम्मा को नहीं पता था कि वह कहां पहुॅच गयी, इसलिए वह अनजान जगह होने के डर से चिल्लाकर अपने बच्चों को याद करती और बार-बार षोर मचाती रहती,समय पर वह अपने बच्चों के नाम लेती और सबको परेषान करती,कभी गन्दगी भी कर देती ,कपड़े खोल कर अपने बंगाली लिवास में घुमने लगती, धानिक जी ने परेषान होकर अम्मा को वहां से ले जाने के लिए कह दिया,कलकत्ता षहर के निवासी सुषंत कुमार गुरू जी से उसके परिवार के सम्बन्ध में बात करने की कोषिष की अम्मा के परिवार का कोई अता पता नहीं चल पाया,कुछ दिन अम्मा मेरे घर पर रही,अम्मा को नहला धुला कर अपने घर पर एक मां की तरह सम्भाल कर रखा,वह मेरे ही बिस्तर में ही सोती थी,अपने बच्चों की तरह समझ कर वह जो भी खाती सबको देती,लेकिन उसकी भाशा कोई नही समझ सका,मेरे के परिवार वालों ने अम्मा को रखने पर बहुत विरोध किया,अम्मा 15 दिन घर पर रही,अम्मा के लिए वृद्वा आश्रम तलाष करती रही,वृद्वा आश्रम मिला भी तो कोई अम्मा को रखने को तैयार नहीं था।कुछ समय बाद महिला आयोग सचिव रमिन्द्री मन्द्रवाल जी से बात कर अम्मा को देहरादून अपना घर में रखने को इंतजाम किया,किसी तरह अम्मा को देहरादून छोड़ने के लिए गाड़ी की व्यवस्था कर अम्मा को देहरादून छोड़ दिया, अब वह वहां पर सुरक्षित और स्वस्थ्य है।लेकिन काफी समय तक अम्मा मेरे के सम्पर्क में रही और जब भी मिलने जाती तो फिर वह मेरे मे पीछे लग जाती और रोने लग जाती।बंगाली अम्मा की तरह जाने कितने लोगों को मैंने ने सहारा दिया और उनको सुरक्षित आश्रय तक पहुॅचाया, चाहे वह किसी जाति या धर्म का हो वह मेरे लिए मेरे परिवार का सदस्य है।


अस्पतालों में पड़े लावारिसों की सेवा अस्पताल में पडे़ लावारिसों की देखभाल उनके लिए कपड़ो का इंतजाम और खाने पीने का सामान और अपनापन देना समय निकालकर उनसे मिलने जाना,एक आदत सी बन गयी,ऐंसा लगता जैंसे मेरे लिए इन सब की सेवा करना ईष्वर का आदेष हो समय ना मिलने पर भी, मुझे इनके खुषी की जरूरत सी महसूस होने लगी और मेंै अपने कदमों को रोक नहीं पाती थी।मेरा मानना है कि समाज में रहने वाले लोगों के लिए सेवा करना सबसे ज्यादा पुण्य का काम है।हर इंसान की सेवा करना हमारा फर्ज बनता हेै।वरना लोगों को खुद के लिए समय नहींे है,तो वह कहां दुसरों के लिए समय निकालेंगे,लोग लाखों की कमाई करने के बाद भी अपने जेब से दुसरों की सेवा के लिए धन देना तो दूर दुआ तक नहीं देते, ऐंसे में इंसानियत को खत्म होने में देर नहीं लगेगी,बंगाली अम्मा की तरह जाने कितने लोगों की सेवा करना मानो मेरे भाग्य में लिखा हो,इन लोगों के अपने हो ना हो ईष्वर ने मुझे इनके लिए अपना बना कर वरदान दे दिया,और एक इंसानियत की जिम्मेदारी दे दी,इनकी गन्दगी साफ करना,नहलाना,खाना खिलाना और जिन्दगी को सकारात्मक ऊर्जा देना,षायद मेरे ही नसीब में हो,ऐंसा लगता हेैं,जाने कौन से जन्म का रिस्ता मेरा इनसे हैे।जो मेंैं इनकी तरफ खींची चली जाती हॅूं,जाने कौन से जन्म के कर्मों का फल ईष्वर इनको दे रहा है।जो ये दर-दर भटकने को मजबूर हो गये हैं।लगता हम सबको इनकी सहायता कर इनकी मुक्ति की तरफ ले जाने का प्रयास करना चाहिये,मुझे लगता है,जाने क्या पता कोेैन भविश्य काल में इस परिस्थिति में कोई अपना मिल जाये,या हम स्वंय इस स्थिति में चले जायें,पता नहीं कौन हमको सहारा देगा भी या नहीं,बस यही सोचकर मुझे लगता की मानवता की अलख जगा कर रखनी चाहिये,वरना यहां तो लोगों को खुद से ही फुरसत नहीं दुसरों को कहाॅं सहारा देंगे,जब हम इंसानियत का झण्डा फहरायेंगें तभी,संसार में मानवता की जय जयकार होगी ऐंसा मेरा मानना है।हर इंसान की जिन्दगी में दुख आता है।दुख में साथ देना, हर इंसान का फर्ज होना चाहिये,इसलिये मैंने हर इंसान की सेवा करने का प्रयास किया,जब दैनिक जागरण को पता चला तो कुछ इस तरह पत्रकार गणेष जोषी जी ने अपने समाचार में मेरे कामों अपने समाचार पत्र में बंया किया-


सेवा के साक्षी अपना घर परिवार एक तरफ रख कर, इंसानियत की लड़ाई से दुनिया में अपना नाम रोषन करने की कोषिष जारी है। चाहे वह किसी जाति,धर्म का हो,सब इंसानियत को जन्म देते हैं।सेवा कभी जाति धर्म नहीं देखता इस बात का संदेष वो बचपन से ही देती आयी है।किसी महिला की लड़ाई हो चाहे बच्चे की या,बुजुर्ग,वह सबकी लड़ाई में सहयोग करती,समाज में इंसानियत के लिए जीना ही जिन्दगी होती है।संसार में अच्छा सब कहते हैं। लेकिन अच्छा कोई नहीं करता।क्योंकि किसी को खुद से फुरसत नहीं है। पैंसा कमाने को इंसान अपनी तरक्की मानता है।उसे लगता है धन बल से सब कुछ खरीदा जा सकता है।चाहे वह कुछ भी हो लेकिन वह यह नहीं जानता की कब विपरीत परिस्थतियां उसको घेर ले कब उसे लाचारों की दुवाओं की जरूरत पड़ जाये कोई नहीं जानता।कर्म के इस पावन धरती पर कब अंधेरा आ जाये किसी को खबर नहीं।


विरान घर में स्मिता अंधेरों के बीच स्मिता-कृश्णा कलोनी,मानपुर उत्तर,रामपुर रोड,हल्द्वानी जिला नैनीताल की स्मिता साह उर्फ मीनाक्षी जो पूर्व केन्द्रीय रेडियो अधिकारी जिला उधमसिंह नगर से रिटायरमैन्ट स्0 श्री नरेन्द्र लाल साह और स्0 श्रीमती भगवती साह आई0टी0आई0 काषीपुर फोरमेैन पद पर कार्यरत की बेटी है।27 साल की स्मिता के माता-पिता उसकी षादी की तैयारी करने वाले थे।उनका सपना था अपनी बेटी को सोने से लद कर विदा करेंगे लेकिन नियति ने ऐंसा खेल खेला कि पिता की वर्श 2000 में की हार्ट अटैक एंव पिता के जाने के बाद माता मानसिक रूप से कमजोर और विक्षिप्त हो गयी कौन जानता की अनहोनी इतनी बुरी होगी माॅ और बेटी दोनों की मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गये।कुछ साल गुजर जाने के बाद माता की 2010 में मानसिक बीमारी से मृत्यु हो गयी।दोनों के जाने के बाद स्मिता की मानसिक हालत काफी बिगड़ गयी।और उनके बनाये गये मकान में अंधेरों के साथ भूखी,प्यासी,तड़पती,सामाजिक षोशण की षिकार बन कर अकेली हो गयी।जो किसमत का मारा हो उसे व्यवस्था भी मुहॅ चिड़ाती है।अच्छी खासी जिन्दगी में जाने किसकी नजर लग गयी एक लोैती बिटिया और अपने माता-पिता की लाडली बेटी मौत की घटना ने उसको झकझोर करके रख दिया।अपने घर के एक कौने में वह अकेली लावारिसों की तरह पड़ी रहती।षासन प्रषासन किसी ने उसकी सुध नहीं ली पास-पड़ोस में हाई प्रोफाइल के लोंगो के होने के बाद भी वह लाचार और जानवरों की तरह बेबसी की जिन्दगी जीने को मजबूर हो गयी।अपने तीन कमरों का मकान ततैया ओैर मकड़ी का निवास स्थान जो खण्डहर में तब्दील होने लगा।सारा सामान आस-पास के लोगों ने उसका यौन षोशण के प्रयास से चोरी कर लिया घर के गेट के खुलते ही स्मिता चैनल से सामने गालों पर हाथ लगाये गंभीर सोच विचार में डूबी रहती।बदन में सिर्फ एक कपड़ा लपेटे रहती। ठंडा गर्म होता भी होगा तो किसी को एहसास नहीं करा पाती।अपने दुखों को उसने जिन्दगी का तोहफा समझकर कबूल कर लिया ओैर अंधेरों को अपने दुख का साथी बना लिया,इसी तरह निरस जिन्दगी ने उसको काफी कठिन रास्रतों से निकालने का हल दे दिया ओैर वह जिन्दगी की जंग नियति को मात देते हुये आगे निकल गयी।एक वक्त था जब वह अपने कलोनी की सस्ंकारी और सभ्य लड़कियों में गीनी जाती थी,लेकिन किस्मत का खेल उसको कई साल तक खेलना पड़ा,नियति के आगे वह बेबस हो गयी,और लाचारी की जिन्दगी ने उसको घेर लिया। स्मिता की मायूस जिन्दगी में मेरी दस्तक


गरीब और असहाय बच्चों के बीच षिक्षा का संचार और षिक्षा सामग्री भेंट की बहन गौरी के साथ मिशन इन्डिया संस्था में निवास कर रहे बच्चे जो गरीबी के कारण षिक्षित नहीं हो पाते ऐंसे बच्चों को रखा जाता हेैं उनके खाने पीने का इंतजाम मिस्टर डेविड भाई करते हेैं। समय समय पर जन्म दिवस हो या खाली समय में बहन उत्तरखण्ड की जानी मानी कविय़त्री गौरी बहन के साथ जाकर बच्चों के बीच खुषियां बांटने का काम हो या षिक्षा सामग्री मिलकर पहुंचाते हेैं। जिससे बच्चों को प्रोत्साहन मिलता हेै। और वह सामाजिक क्षेत्र में अपना सहयोग करते हैं


प्राईमरी पाठषालाषलाओं में स्कूल के बच्चों को स्वतंत्रता दिवस पर फल वितरण कर उनको प्रेरित करना स्ववंत्रता दिवस का महत्व और षिक्षा की ताकत -प्राईमरी पाठषालाषलाओं में बच्चों को षिक्षा के लिए प्रेरित करना ,समाज निर्माण में अहम योगदान हेतु देेने हेतु हमेषा उनके बीच रहने और अपनी सेवा का अनुभव उनके बीच बांटने के लिए हर वर्श,हर ऐतिहासिक पल मे उनका सहयोग और प्रतिभाओं को जानने के लिए उत्सुक रहना,अपने सामाजिक प्रयासों को बताकर उनको भी सेवा के लिए तैयार करना मेरा मकसद होता है।


रूद्रपुर स्वधार बाल गृह में मुक बधिर बच्चों को खुषियां खुषियां बांटने का अधिकार हर इंसान को है। घर हो या बेघर हर जगह खुषियां बांटना मेरा कर्म है। यह हर इंसान सीख ले तो दुनियां में कोई दुखी ना रहे,इन बच्चों का क्या कसूर जो देख नहीं सकते,सुन नहीं सकते,चल नहीं सकते,फिर भी ईष्वर की सजा ऐंसी है कि वह कुछ कर नहीं सकते,यदि हम एक पल भी इनकी जिन्दगी मे खुषियां देते हेैं, मेरा मानना है,कि ईष्वर हमको दुगुनी खुषी का हकदार बना देता हेै।इनके माता-पिता नहीं हैं लेकिन हम इनके माता-पिता बनकर इनका जन्म दिवस बना सकते हेैं। इनके लिए अपने बच्चों की तरह सामान लाकर इनको बांट सकते हैं।यही सोचकर अनाथ बच्चों के साथ उन बच्चों का जन्म दिवस मनाकर उनके बीच षामिल हो गयी।


 नषा समाज को कुपोशित कर रहा है। नषे की लत और सार्थक अभियान- एक दुसरे को नषे से दूर रखो पहल से बच्चों को प्रेरित किया साथ में समाज सेवी जानकी रैंगाई दीदी ओैर मैं। दोनों ने हर स्कूल में जाकर नषे को दूर करने के लिए कहा षिक्षित समाज के बीच नषे की लत को बढ़ता देख हम समाज में जागरूकता अभियान से बच्चों के बिना समाज का विकास संभव नहीं बच्चों के भविश्य पर नषे व भीख का प्रभाव प्रत्यक्ष एंव अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण समाज एंव परिवार में पढ़ रहा है,भीख बच्चों को नषे की तरफ धकेलते हुए आलसी बनाकर अराजकता मेें डालता जा रहा है,यही अराजकता उन्हें अपराधिकता की ओर धकेल रहा है,तीन 2 साल से 18 साल तक के 20 प्रतिषत बच्चे स्कूल ना जाकर भीख मांगकर नषा करते हेेैं,आज समाज की नींव कमजोर होने लगी है,जंहा आज समाज में बच्चे दिमागी रूप से कमजोर एंव अषिक्षित होते जा रहे हेैं,वही दुसरी तरफ हम एक विकसित देष की परिकल्पना से बाहर होते जा रहे हैं। समाज के चहुॅमुखी विकास में बच्चों का महत्वपूर्ण योगदान हेै, जिससे समाज की प्रगति व विकास सम्भव है, षिक्षा के अभाव के कारण छोटे-छोटे नौनिहालों का भविश्य दांव पर पर लगा है, जिससे बच्चों का षारीरिक व मानसिक विकास खत्म होता जा रहा है, ,एक बच्चे का भविश्य एक राश्ट्र को मजबूती दे सकता है, भीख व नषे की लत बच्चों को चोरी करने को मजबूर कर देता है,जो समाज के लिए बहुत नुकसान दायक हो रहा है, यदि समाज का सामाजिक परिवेष मजबूत होता तो छोटे-छोटे हाथों से खेलने वाले बच्चे कभी हाथ में कटोरा लेकर कभी भीख नहीं मांगते, नषे और भीख की इस लत ने बच्चों को हर गलत कार्य की तरफ धकेल दिया है, नषे के कोरोबारी अपनी मोटी कमाई से,स्वंय इस देष को बर्बाद करने में तुले हुए हेैं,बच्चों की वास्तविक जिन्दगी भीख और नषे से दूर तभी हो सकती है, जब समाज की एक पहल सही दिषा में मुड़े जहां तक बच्चों के भविश्य का प्रष्न हेै,उनके षिक्षा व स्वास्थ को लेकर सबसे अधिक अध्ययन किया जाना चाहिए,अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए,जिससे समाज में बाल षिक्षा एंव उज्जवल भविश्य को सकारात्मक दिषा मिल सके।ऐेसे गरीब और असहाय बच्चों के लिए जिनके पास खाने की व्यवस्था नहीं हेै भारत सरकार या राज्य सरकार द्वारा संस्थानों को उनके भविश्य का जिम्मा सौंप देना चाहिए।जिससे हर जगह पर बच्चों के भविश्य के लिए जोर दिया जा सके और हमारी सामाजिक पहल को देष की आवाज मिल सके।राज्य की लड़ाई में बेटियों की भागीदारी सबसे ज्यादा होती है।इस पर एक मीटिग हाॅल में अपनी सोच को सकारात्मक दिषा में ले जाने हेतु अपने विचारों का आदान प्रदान कैंसे होता है। मेरे द्वारा विचार रखा गया।  महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता और एक दुसरे की सहायता का प्रयास हिन्दू और मुसलिम महिलाओं को स्वरोजगार के हुनर सिखाना और महिला षक्ति की ताकत को उपयोग करने के लिए महिलाओं को स्वंय सहायता समूह के जरिये सरकार की नीति को बताना हर षनिवार बनभूलपुरा हल्द्वानी में रात 9.00 बजे के समय वहां की साारी महिलायें अपनी समस्याओं को लेकर वहां एकत्रित होती है। जिससे वहां के पार्शद द्वारा सहायता हेतु सुंझाव दिये जाते है।और उन सुझावों में पुरे सप्ताह कार्य किया जाता है।मैने देख की महिलायें अपने बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए भेजने के बजाय काम करने के लिए लगा देती है। ताकि वह बच्चा दो पैंसा लाकर घर में दे फिर चाहे वह कुछ भी काम करे।लेकिन माता-पिता के लिए बच्चों की षिक्षा सबसे जरूरी होती है।इस बात को लेकर हमेषा इनके बीच जाना होता है। यदि वह गरीब है तो उनके लिए षिक्षण सामग्री एकत्रित करनी होती है।बेटियों को षिक्षा के लिए प्रेरित करना हमारी प्राथमिकता होती है।क्योंकि मुसलिम समुदाय मे बेटी कम षिक्षा ग्रहण करती है।जिससे वह अपने कार्योें में जानकार नहीं हो पाती और आये दिन अपने परिवार के लिए अज्ञानी मोहरा बनकर रह जाती है।और अपने परिवार को सक्षम दिषा की तरफ नहीं ले पाती और आये दिन हर घर में लड़ाई झगडे़ होते है।ना समझी के कारण बर्बादी की कगार में चले जाते हैं।जब तक हम मजबूत नहीं होंगे तब तक हमारा समाज कमजोर रहेगा। इसके लिए हर महिला को षिक्षा की तरफ ले जाने का प्रयास हमेषा जारी रहेगा।चाहे उसकी उम्र कुछ भी हर तरह से षिक्षा के लिए प्रयासरत रहना चाहिये। हम षिक्षित तो हमारा समाज षिक्षित तभी हम अपने रोजगार को चलाने के लिए सक्षम हो सकेगें। महिलायें आज हर दिषा में अपना किरदार निभा रही हैं लेकिन कुछ महिलायें अपने घर तक सीमित रहती हैं। ओैर अंधेरों के बीच जिन्दगी का बखान करने लगती है।सकारात्मक दिषा हर महिला को बदल देता है। जिससे हर परिस्थिति को वह खुषी से निपटा कर अगे चलने लगती है।यदि हर पढ़ी लिखी महिला हर निरक्षर दुसरी महिला को सहारा दे तो षायद ही इस दुनिया में कोई महिला दुखी हो।हम आपस में ही एक दुसरे से ईश्या करते हेैं।इन बातों का फाइदा दुसरा पुरूश उठाकर आगे निकल जाता है।इस तरह जो भी महिला मेरे सम्पर्क मेैं आती है।उसे सही दिषा और सही राह दिखाना मेरा मकसद होता है।जिससे वह संसार के हर कोने जिन्दगी जीत कर निकले और हमारा समाज व देष प्रगति के पथ पर चले।नारी सम्मान की लडाई के लिए लड़ना बहुत आसान होता है,लेकिन आज तक कोई भी सरकार इस सम्मान की लड़ाई नहीं लड़ सकी है।भले ही इस चिंगारी से कई सरकारें आती और जाती हैं ,परन्तु आज तक महिलओं को कभी सामाजिक सम्मान नहीं मिला,क्योंकि धरेलू हिंसा की मार झेलने वाली महिलायें आज भी अपने हकों को नहीं ले सकी हेैं।आवाज उठते ही मार दी जाती हेै।जिसके लिए हमारी सरकारें कुछ नहीं कर पाती,कभी जिन्दगी की लड़ाई में अपनों से ही मात खा जाती हेैं।  अमर उजाला रत्न से सेवा के क्षेत्र में सम्मान सेवा के क्षेत्र में उस समय नैनीताल जिले से केवल चार लोग सम्मानित हुये थे। पर्यावरण के क्षेत्र में रेवती काण्डपाल जी, दृश्टिबाधित बच्चों की सेवा में श्री ष्याम सिंह धानिक जी,षिक्षा के क्षेत्र में प्रो0 श्री संतोश मिश्रा जी,सेवा के क्षेत्र में श्रीमती गुुजंन बिश्ट अरोरा यह सम्मान हमको कर्ज से झुका देता है कि अब सेवा और अच्छी तरह करनी चाहिये ,समाज ने हमको सेवा के लिए चुना हैै। तो यह समाज ही हमको आषीर्वाद देता है।  गदरपुर में स्कूली छात्रों के साथ अपनी सेवा का संचार और अनुभव का प्रचार सेवा के क्षेत्र में मेरे द्वारा जो भी अनुभव लिये सब बातों को संचारित करने के लिए गदरपुर की पर्यावरण संस्था द्वारा अपनी सेवा को बच्चों के बीच अनुभव साझा करने का मौका मिला ।जिससे बच्चों के मन में षिक्षा के साथ-साथ सेवा की अलख जगे और हमारा समाज षिक्षा के साथ सेवा के लिए भी तत्पर रह सके।क्योंकि यही वो भावी बच्चे हैं जो समाज में अपनी पहचान छोड़ने के लिए षिक्षा ग्रहण करते है।बिना सहयोग के इनको दिषा नहीं मिल पाती ये दिषा अन्य विषेशज्ञों द्वारा समय-समय पर मिलते रहे तो। इंसान वास्तविकता से कभी हार नहीं मान सकता।यही उम्र होती है,जब हमारे समाज का युवा कुछ नया करने का जज्बा रखता है।और एक नई सोच के साथ सामाजिकता को बदलाव देने का प्रयास करता है। स्कूल के बच्चों में ये नषाखोरी संगति के चलते फैलती हे, कम उम्र में ये बच्चे भटत जाते हैं, और उेसे लोगों के साथ संगति करते हेै,जो नषा को अपना जीवन समझते है, बच्चों के अलावा युवाओं को भी कई बार संगति ही बिगाड़ती है, युवा पीढ़ी के कई दोस्त होते हैं, जो नषा करते हैं, ओैर देखा देखी में इसके आदि हो जाते हैं, और साथ वालों को भी नषा करने के लिए प्रेरित करते हेैं, हमारा समाज यदि नकारात्मक और स्वार्थी है तो आने वाली युवा पीढ़ी का भविश्य भी नकारात्मक होगा। यह बात उस घृणित और कुत्सित प्रवृत्ति की है जो अपने ही आने वाले कोमल-कच्चे भविश्य को छलने में षर्म या झिझक महसूस नहीं करती? इंसानियत जैंसे लफज कितने बेमानी हो जाते हैं। जब बैंगलूरू जेंैंसे राज यूं खुलकर एक दर्दनाक तथ्य बनकर सबको अधिर कर जाते हेैं। हम मानव जो फूल,पत्ते,तितली,पंछी और चींटी के प्रति भी दयालु हो उठते हेेैं। क्या हमारे ही बीच का एक वर्ग इतना जालिम हो सकता है, कि इंसान के बच्चों को भी जानवरों की तरह इस्तेमाल करें? विकास का सम्बन्ध केवल कल-कारखाने,बांधों और सड़कों के बनाने से नहीं है, बल्कि इसका सम्बन्ध बुनियादी तौर पर मानव जीवन से है जिसका लक्ष्य है लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आधात्मिक उन्नति। बीसवीं सदी के लिए भारत को अपनी तैयारी को सत्य साथ ही एक महाषक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करना अत्यावष्यक है। आज समाज केवल अपने से मतलब रखता है दूसरे के साथ क्या हो रहा है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है।  नषे के लिए सारा दिन कुढ़ा बिनते बच्चों के भविश्य की चिंता आज भी हर साल स्वतंत्रता दिवस पर जब राश्ट्रीय ध्वज फैलाने हमारे देष के प्रधानमंत्री दिल्ली केैनाट प्लेस पर पूरे राश्ट्र को सम्बोधित कर रहे होते हैं। तो उस समय पुरी दुनिया की निगाह राश्ट्र ध्वज की तरफ होती है, और उसी जगह के आस पास देष का भविश्य नषे की हालत में सो रहा होता है, अफसोस की हमारे देष में हर जगह आज देष का भविश्य अधर में लटक रहा है, क्या देष का सोता भविश्य देष की मुख्यधारा का हिस्सा बन सकेंगे या हाषिए पर रहना उनकी तकदीर बन गया है, जहां एक तरफ भीख मांगता बचपन सिमट रहा है, वहीं दुसरी तरफ नषे की लत ने बच्चों का बचपन खत्म हो गया है, भारत में 20 लाख से अधिक लोग नषा करते हैं। तो कुछ नषे को तेजी से बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। भीख और नषा देष को मजबूती से जकडे़ हुए हैं, नषे की लत की वजह से देष का भविश्य षिक्षा एंव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है. देष का विकास बच्चों के भविश्य पर निर्भर होता है बच्चे नषे से सुरक्षित नहीं हैं ,बच्चे सुरक्षित नहीं तो कोई इंसान सुरक्षित नहीं आज देष का भविश्य नषे में पूरी तरह सिमटकर खत्म होता जा रहा है, एक विकसित देष के निर्माण में बच्चों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान हेै, जहां एक तरफ बड़ेे घरों के बच्चे अपनी षान ओ-षोकत के लिए नषे की तरफ जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब और अनाथ बेसहारा बच्चे एक वक्त की रोटी के लिए भीख मांगकर नषे की तरफ बड़ते जा रहे हैं। प्राचीन काल की पीढ़ी षिक्षा ग्रहण करने के लिए मीलों दूर जाकर परिश्रम करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी नषे,चोरी व भीख के लिए समाज को खोखला कर रहे हेेैं, देष के लिए महत्वपूर्ण धरोहर बच्चे हैं उनकी देखभाल और चिंता करना हमारी जिम्मेदारी हैं।मेैंने देखा की 20 रू0 के ट्ूयूब को हासिल करने के लिए सारा दिन कुढ़ा बिनते हैं,वहीं दुसरी तरफ कुछ हार्डवेयर व्याापारी इन बच्चों को नषे का सामान देकर अपने बच्चों को पाल रहे है। हल्द्वानी हार्डवेयर स्टोर से तमाम नषे का सामान बरामद किया,और व्यापारी पर केष कर 10,000रू0 का जुर्माना लगवाया। जिससे अन्य लोग बच्चों को नषा न दे सकें।कुछ समय तक हल्द्वानी के तमाम हार्डवेयर की दुकानों में नषे का सामान बन्द हो गया, इस तरह कुछ हद तक आज भी नषे का सामान बच्चों को कम दिया जाता है।  प्राईमरी पाठषाला वनभूलपुरा हल्द्वानी मैं हर समुदाय के बच्चों के बीच पन्द्रह अगस्त की खुषी। देष आजादी की जष्न हर दिषा मे मनाता है। लेकिन हम पारिवारिक या नौकरी पेषा वाले होकर झण्डे के नीचे आर्षीवाद लेने भूल जाते है। अपनी आजादी का दिन भूल कर दुनियादारी मे ंलग जाते है। लेकिन में स्कूल के बीते दिनों की याद कर,झण्डे के पास खड़ा होना कभी नहीं भूलती इसलिए आजादी का हर दिन अपना बचपन याद कर बच्चों के लिए अपने वेतन से फल और मिठाई ले जाना कभी नहीं भूलती, बच्चों की प्रतिभाओं में षामिल होकर उनको आजादी की लड़ाई के बारे में बताकर उनके अन्दर देषभक्ति जगाने का काम करती हॅूं,और हर सहयोग के लिए उनको तैयार करती हॅॅू।जिससे अमन और चैन से हर इंसान जिन्दगी गुजारने के लिए एक दुसरे के साथ चल सके। आज हमारे बच्चे हिन्दू मुसलिमवाद मे उलझते जा रहे हैं, उनके बीच भेद-भाव की लकीर बचपन में ही उनके अनपढ़ माता-पिता द्वारा खींच ली जाती है। जिससे वो अपने ही देष के झण्डे के खिलाफ खडे़ होकर विरोधी देषों का नारा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं।और अपने देष का झण्डा फैलाने से कतराने लगते हैं। बच्चों के मन में मानवता और भाईचारा हमेषा बनाये रखने के लिए हमेषा उनको अपनेपन का सहारा देना जरूरी होता है। यही सोचकर मेैं हमेषा उनके लिए कापी,किताब,बैग,जुते देकर उनको सहारा देने का प्रयास करती हॅूं।जिससे इनके मन में हर धर्म के लिए प्यार और साहस का संचार हो सके।कि वह भी हमारी तरह सबकी सेवा का संकल्प लेकर आगे बढ़े और मानवता का विष्वास कायम रख सके, एक दुसरे पर भरोसा कर इंसानियत को जिन्दा रख सके,और गलती मेें एक दुसरे को माफ कर आजादी की अच्छी जिन्दगी जी सके,विष्वास की डोर हम ही कमजोर करते है। वरना बच्चे तो फूल होते हेैं।जो नाजूकता से बिखर जाते हैं।इनको प्यार और खुषी से षिक्षा की तरफ ले जाने का मेरा मकसद होता है। जिससे ये हमारे देष का नाम रोषन कर सके।और भारत माता के नारों से विष्व में अपना परचम लहरा सकेें।  सर्व षिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को स्कूल जाने का अधिकार है। हल्द्वानी रेलवे स्टेषन में रहने वाले सारे बच्चे कुढ़ा बीनते हैं, भीख मांगते हेैं।इनके लिए धरोहर संस्था से सम्पर्क कर उनको चिन्हित कर स्कूली षिक्षा का प्रयास करते हैं। इन बच्चों कि लिए सप्ताह में एक बार बाल चैपाल लगाकर खेलकूद और षिक्षा के जरिये सकारात्मक दिषा की तरफ ले जाने का प्रयास करती हॅूं। छुट्टी का यह दिन सिर्फ दो घंटा बच्चों की जिन्दगी बदलने का प्रयास कहलाता हैं। सभी बच्चों से मेरी अच्छी पहचान हो गयी है।भीख को बन्द करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। बच्चों को मारे पीटे बिना उनकी तरह बच्चा बनते हुये।उनको अपनापन देकर उन्हें भीख की जद से बाहर निकालने का मेरा यह प्रयास काफी हद तक सफल हो रहा है।जहां मिलते हैं वही हाथ पकड़कर बातें कर उनका दिल जितना इतना आसान नहीं होता।उनके दिल तक एहसास को महसूस करने वाले ही उनकी सोच तक पहुंच पाते हैं जिसका कहना वह मानने लगे।  बाल भिखारीयों की जिन्दगी से रूबरू होते मंत्रीगण यह छोटा सा बच्चा नरेन्द्र जिसके भविश्य की चिंता मुझे हमेष रहती है।यह बहुत होनहार है। लेकिन इसके माता-पिता की लापरवाही से यह भीख मांगने में मस्त रहता हेैं उस भीख से अपने खाने पीने की चीजें खरीदता है। और कुछ नषेड़ी बच्चों को देता है जिससे वह सब बच्चे इसका दुरूपयोग करते हैं। यह मेरे पास अक्सर घर पर आकर पढ़ता हेैै। हाल ही मेें धरोहर संस्था में यह समाज कल्याण मंत्री श्री यषपाल आर्या जी से मिलकर अपनी कलाकारी को पेष कर साबासी हासिल करता है । और सबका मनमोह लेता है। समाज की लापरवाही की वजह से आज देष का भविश्य अध्ंाकार में डुब रहा हेै, अपने फर्ज को निभाते हुए हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम समाज में छोटे बच्चों को कभी भीख ना दें ओैर न उन्हें नषे के लिए प्रेरित करें तो स्ंवय ही हमारा समाज एक नई दिषा की तरफ ले जायेगा। समाज में अक्सर वर्तमान में लोगों को भीख न देने 80000 पम्पलेट बांटकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जिससे वर्तमान समय में हल्द्वानी षहर में बच्चों का भीख मांगना बंद हो गया है, साथ ही हल्द्वानी षहर में लावारिस औार विक्षिप्त लोगों के रहने और उनको सुरक्षित स्थान आषादीप के सहयोग से नई जिन्दगी देने का कार्य करना मेरी प्राथमिकता हेै। बचपन बचाओ के नाम से फेसबुक पेज देख सकते हैं। ओैर बाल-चैपाल यूटूयब में देख सकते हैं, आपने बच्चों को भीख मांगते देखा होगा कभी हम उन्हें कुछ दे भी देते होंगेे, तो कभी डांटकर आगे बढ़ जाते होंगे। पर क्या कभी हमने यह सोचा है कि इन बच्चों की दुनिया कैंसी है? ये अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तरह क्या स्कूल जाना चाहते हेेैं? ये अपनी मर्जी से भीख मांगते हैं या इनसे मंगवायी जाती है? भीख में मिले पैंसों से ये क्या करते हेैं, क्या कभी इन्होंने भीख मांगना छोड़कर कुछ और करने के बारे में सोचा है? बड़े होकर ये क्या करेंगे, यदि समाज अपनी पीढ़ी को यह सोचकर पैदा करें, तो कि हमारी पीढ़ी कभी गलत रास्ते पर न चलकर सही कदम चलेगीह और हमारा योगदान समाज की भलाई और विकास होगा तो षायद हमारे रास्ते हमेषा सही दिषा में होंगे समाज की हर बुराई को हटाने में हमारा योगदान बराबर का होना चाहिए। जिससे भारत एक विकसित देष की श्र्रेणी में आने में सक्षम हो सके और हमारा राश्ट्र एक संगठित राश्ट्र बन सके कल्पनायुक्त भारत का चित्र उकृश्ठ चित्रों में षामिल हो सके। विष्वसनीयता बनी रहे समाज जागरूक होगा तो सत्ता भी जागरूक होगी, हमारे अधिकारों का कभी हनन नहीं हो सकेगा। जिससे समाज में बदलाव की स्थिति पैदा हो जायेगी,और हम अपने देष को एक विकसित देष में षामिल कर सकेंगे।

बेटी जीवन का आधार है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अन्तर्गत सारी सुविधायें बेटियों को नहीं मिल पाती धरातल पर कहीं भी कोई इनके लिए कार्य नहीं करता चार दिल अभियान से इनकी जिन्दगी को तमाषा बनाकर हर इंसान बेटी की स्ववंत्रता से खेल रहा है। जहां बेटियों को उनके अधिकार मिलने चाहिये वहां इनके लिए कोई कार्य नहीं होता षोशण अत्याचार अषिक्षा, हिंसा की पुतली बनकर रह गयी हेैं ऐंसे मेें मैने इनकी षिक्षा का बेड़ा उठाया और आज 50 बच्चियां मेरे साथ स्कूल चलो का नारा लेकर चलती है। जो स्कूल छोड़ चुकी हैं या स्कूल नहीं जा पायी या उनके परिवार वाले उनको स्कूल नहीं जाने देते थे ऐंसे बच्चे अक्सर मेरे पास आते हैं इनके लिए हमेषा मेरा सकारात्मक रवैया रहता है। जिससे यह आज खुद के लिए जीने का प्रयास कर रही है। और भीख की दुनिया से निकलकर उड़ान की तरफ निकल पड़ी है। अपने वेतन से गरीब लड़कियां जो स्कूल नहीं जा पाती उनकी पढ़ाई की सारी जिम्मेदारी उठायी है। समाज में बाल भिखारियों को षिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने हेेतु वह लगातार प्रयासरत हेैं। जो समाज में बाल चैपाल के नाम से जाना जाता हेै। बाल चैपाल उन बच्चों का समूह है जो अपनी जिन्दगी से ंभटकते जा रहे हैं। और षिक्षा,मानवता से दूर रह कर खुद को नषे की तरफ ले जा रहे हैं। और जिसमे मानव तस्करी बाल षोशण ,देह व्यापार घटनायें बच्चों के साथ हो रही घटनायें उत्तराखण्ड ही नहीं पुरे देष के लिए खतरनाक साबित हो रहे हेैं। राश्टीय बालिका दिवस के कार्यक्रम में बेटियों को जागरूक करने हेतु बताया गया कि में इस देष लिए एक मिषाल है।बेटी जो समाज को नई दिषा देने का काम कर रही हैं।सामाजिक ,राजनैतिक,पारिवारिक,आर्थिक,चाहे कोई भी क्षेत्र हो सब जगह बेटी का परचम लहरा रहा है। जरूरत है तो सिर्फ मानसिकता बदलने की जो हर दिन षर्मनाक होते जा रहे हैं।पुरूश प्रघान समाज में महिलायें हमेषा मात खा जाती हेैं लेकिन प्राचीन समय में भी महिलाओं का वर्चस्व सर्वव्यापी था। और हमेषा रहेगा। इसका जीता जागता उदाहरण है श्रीमती इन्द्रागांधी जो देष की पहली प्रधानमंत्री बनी और राजनैतिक की सबसे ताकतवर कुर्सी पर विराजमान हुई। और देष की बागडोर अपने हाथों में लेकर समाज को दिखाया कि वह देष को अपने बल बुते पर अपनी सोच और ताकत से चला सकती है। 24 जनवरी को राश्टीय दिवस के रूप में बनाया जाता है।इस दिन को याद करते हुए हमेषा दुनिया को दिखाया जाता है कि महिला भी देष का प्रतिबिम्ब है और हमेषा समाज को आईना दिखाने का काम करना उसकी सबसे बड़ी ताकत हैै।इसी ताकत के बेस पर आज राश्टीय बालिका दिवस बनाया जाता है।वो बेटियां जो कभी अपनी पहचान नहीं बना सकती लेकिन अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर सकती है।घरों में काम करने वाली बेटियां जो कभी अपनी आजादी की जिन्दगी नहीं जी सकती।अपने की घरों में षोशण का षिकार होती बेटिया घर के एक कोने तक सीमित रह जाती है।बाहर की दुनियां देखने के पहले ही वह गोद में मार दी जाती है।ऐंसे में समाज बेटियों को एक ही तर्ज पर सुरक्षित करने का काम कर सकते हैं।जिससे आज बालिका दिवस पर कई बेटियों को उनके अधिकार और उनकी सुरक्षा की जानकारी दी गयी।भीख नषा और दैहिक षोशण से वह हमेषा दूर रहें जिससे वह भारत की पहली प्रधानमंत्री इन्द्ररा गांधी की तरह सर्वव्यापी कुर्सेी पर विराजमान रह कर देष में अपना नाम रोषन कर सके।इसी बीच बेटियों ने अपनी असुरक्षा के बारे में जिक्र किया और उनसे लड़ने का फैसला लिया समस्त लड़कियों ने देषभक्ति गीत गाकर सबके मन को लुभाया और संकल्प लिया की वह हर हाल में षिक्षा और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ेंगी,चाहे उसके लिए समाज से ही क्यों ना लड़ना पडे़।जवाहर नगर,गफूर बस्ती, आदि जगह की बेटियों ने बाल चैपाल के जरिये राश्टीय बालिका दिवस मनाया मेरी टीम सदस्य,दीपिका रातैला और बहनों ने यह कार्यक्रम बेटियों को जागरूक करने हेतु कराया बेटी जिन्दाबाद।के नारों से षहर गुंज गया।


लावारिस मुसलिम बुजुर्ग जिस दिषा में जाऊं वही दीन दुखियारी,मन परेषान हो जाता है। खुद का दर्द खत्म होता नहीं कि फिर किसी के दुखों का आवाज आने लगती है।हाथ पैर स्वंय ही उसकी सेवा के लिए उठने लगते हेंैं। पर्स में पेैसे हो ना हो लेकिन हौसला खत्म नहीं होता, ईष्वर की मदद मिल जाती है। रास्ते खुद ही खुलने लग जाते हैं। भूख प्यास परेषानी सारे जरूरी काम सब भूल जाती हूॅं। प्रयास रहता है कि किसी तरह इसकी जिन्दगी बचा कर इसकी सेवा करू,यही सोचकर हल्द्वानी के बनभूलपुरा से नाली के किनारे पड़े सलीम खान को उठाया,काफी बुजुर्ग और बीमार इंसान गन्दी नाली के किनारे चोट के कारण तड़प रहा था। उसका मुहॅ पानी और भूख से सुख रहा था, एक पल के लिए लगा कि मेरा रास्ता वह लेकिन उसकी तड़पती हालत मुझसे देखी नहीं गयी।उसको वहां से उठाने के लिए हाथ बड़ने लगे आस-पास के लोगों ने काफी भीड़ लगा ली और उसकी सेवा के लिए कई हाथ उठ गये, कई लोग उसके आस-पास से गुजर रहे थे।लेकिन षायद ईष्वर चाहता था कि मैं वहां से गुजरूं तो दुसरा रास्ता बंद कर दिया,उस रास्ते मुझे भेज दिया जिस रास्ते सलीम खान तड़प रहा था। और मेरे साथ दो स्कूली छात्रायें और आस-पास के कई लोग षामिल हो गये और सब लोगों न मिलकर उसे 108 में रखा लेकिन जब एम्बूलैंस वाले ने बताया कि अस्पताल प्रषासन इनको भर्ती नहीं करेगा तो मुझे उनके साथ अस्पताल जाना पड़ा,वरना उसको कोई भर्ती नहीं करता। तीन दिन की सेवा के बाद सलीम खान ने दुनिया छोड़ दी वह बीमारी की वजह से सो नहीं पाता था। इलाज करने के बाद भी वह कमजोर हो गया और अचानक रात के समय दर्द भरे इस जिन्दगी से दुनिया को अलविदा कह दिया।दुसरे दिन पुलिस ने पंचनामा भरकर उसके षरीर को समाप्त करने का इंतजाम कर दिया।