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प्रस्तावना

हर देष का सविंधान उसका आधार होता है। जिसमें उस देष के मौलिक अधिकारांे एंव संविधानों को बताया गया है। इसी तरह भारत एक षक्तिषाली एंव प्राकृतिक सौन्दर्य भरा वातावरण का देष माना जाता है। यहां का सोैन्दर्य विष्व में बहुत प्रसिद्व है। विष्व बाजार में लोग भारत का नाम पहचानते हेेैं,भारत तेजी से आगे बढ़ रहा ह,ैै नई संभावनाओं,संरचनाओं और सृजन के पंख लगाकर,अर्थव्यवस्था का सूचकांक ऊपर जा रहा है।जहां एक ओर देष की तकनीक,अनुसंधान,कूटनीति और अतंराश्ट्रीय छवि लगातार सुधर रही हेै,वही दुसरी ओर कहीं न कहीं भारत के नागरिकों के एंेसे समूह और चेहरे हैं,जो अपनी भारतीय होने की पहचान का प्रमाण खोजते फिर रहे हैं, इन लोगों की आंख में बदलते भारत में दखल बनाकर चलने की तमन्ना है, तो दूसरी आंख में कई अनुसरित-अधूरे-अनकहे सवाल जिनका जबाब किसी के पास नहीें है, इनके जहन में इस बात की खुषी होती है कि वे भारत के नागरिक हैं,

आज भी हर साल स्वतंत्रता दिवस पर जब राश्ट्रीय ध्वज फैलाने हमारे देष के प्रधानमंत्री दिल्ली केैनाट प्लेस पर पूरे राश्ट्र को सम्बोधित कर रहे होते हैं। तो उस समय पुरी दुनिया की निगाह राश्ट्र ध्वज की तरफ होती है, और उसी जगह के आस पास देष का भविश्य नषे की हालत में सो रहा होता है, अफसोस की हमारे देष में हर जगह आज देष का भविश्य अधर में लटक रहा है, क्या देष का सोता भविश्य देष की मुख्यधारा का हिस्सा बन सकेंगे या हाषिए पर रहना उनकी तकदीर बन गया है, जहां एक तरफ भीख मांगता बचपन सिमट रहा है, वहीं दुसरी तरफ नषे की लत से बच्चों का बचपन खत्म हो गया है, भारत में 20 लाख से अधिक लोग नषा करते हैं। और 35 लाख लोग सड़कों पर भीख मांगकर जिंदगी गुजार रहे हैं, तो कुछ नषे को तेजी से बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। भीख और नषा देष को मजबूती से जकडे़ हुए हैं,सड़को मे भीख मांगता बचपन देष के लिए षर्मनाक स्थिति ही नहीं समाज की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है, भीख और नषे की लत की वजह से देष का भविश्य षिक्षा एंव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर देष का विकास बच्चों के भविश्य पर निर्भर होता है बच्चे नषे से सुरक्षित नहीं हैं,बच्चे सुरक्षित नहीं तो कोई इंसान सुरक्षित नहीं आज देष का भविश्य भीख और नषे में पूरी तरह सिमटकर खत्म होता जा रहा है, एक विकसित देष के निर्माण में बच्चों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान हेै, जहां एक तरफ बड़ेे घरों के बच्चे अपनी षान ओ-षो के लिए नषे की तरफ जा रहे हैं।


तरफ गरीब और अनाथ बेसहारा बच्चे एक वक्त की रोटी के लिए भीख मांगकर नषे की तरफ बड़ते जा रहे हैं। प्राचीन काल की पीढ़ी षिक्षा ग्रहण करने के लिए मीलों दूर जाकर परिश्रम करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी नषे,चोरी व भीख के लिए समाज को खोखला कर रहे हेेैं, देष के लिए महत्वपूर्ण धरोहर बच्चे हैं उनकी देखभाल और चिंता करना हमारी जिम्मेदारी हैं।नषे की लत लगने के बाद बच्चे अपने रंग रूप की सुध लेना भूल जाते हैं। नषीले पदार्थों का कारोबार पुलिस की जानकारी के बगैर नहीं चल सकता है। पुलिस कहती है कि यह नेटवर्क इतना फैला ओैर व्यापक हैै। कि यह कहना मुष्किल हेै कि कौन से लोग बच्चों को नषे की आपूर्ति करते हेै। आज भारत की दषा नषे और भीख से ज्यादा भ्रमित होती जा रही है। भारत में नषे की खेती हिमांचल प्रदेष,उत्तराखण्ड,कर्नाटक,तमिलनाडु,आंध्रप्रदेष,केरल, पंजाब,बिहार,झारखंड आदि जगह होती हेै। जो खेतों से मेट्रो षहरों पहुंचती हेै। इस तरह के नषीले पदार्थ हर रोज टेªन और सड़क मार्ग से कभी बसों में छिपाकर,फलों और सब्जियों वाले ट्रक में एक जगह से दुसरी जगह तक भेजे जाते हेैं।बच्चों को नषीले पदार्थ देने वालों में मुहल्ले में चलने वाले आॅटोरिक्षा और कैब ड्राईवर,घोबी और सिगरेट आदि की दुकानें भी षामिल हे। स्थानीय कैमिस्ट नषा बेचने में पीछे नहीं हैं। अपनी रोजी- रोटी को अग्रसर करने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को नषा देने में नहीें कतराते हैैं। षहर के भीतर ऐंसे दलाल अक्सर किसी निर्माण स्थल या कुछ सुनसान कलोनियों में नषीले पदार्थ पहंुचाते हैं। जहां इनको छोटे पैकेटों मेे डालकर अन्य दूसरी जगहों में पहुंचाया जाता हेैै।आज माफिया इतना षातिर हो गया है। कि अपने कारोबार को आगे ले जाने के लिए बच्चों के भविश्य के साथ खिलवाड़ करने में पीछे नहीं हटता और धीरे-धीरे वह इन नौनिहालों के जरिये पूरे देष में नषे का व्यापार करने में सक्षम होते जा रहे हैं।


बच्चों के बिना समाज का विकास संभव नहीं बच्चों के भविश्य पर नषे व भीख का प्रभाव प्रत्यक्ष एंव अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण परिवार एंव समाज में पढ़ रहा है, भीख बच्चों को नषे की तरफ धकेलते हुए आलसी बनाकर अराजकता मेें डालता जा रहा है, यही अराजकता उन्हें अपराधिकता की ओर धकेल रहा है, तीन साल से 18 साल तक के 30 प्रतिषत बच्चे स्कूल ना जाकर भीख मांगकर अपने परिवार का पालन-पोशण या अपने माता-पिता के षौक पूरे करते हैं। या नषा करते हेेैं,आज समाज की नींव कमजोर होने लगी है,जंहा आज समाज में बच्चे दिमागी रूप से कमजोर एंव अषिक्षित होते जा रहे हेैं,वही दुसरी तरफ हम एक विकसित देष की परिकल्पना से बाहर होते जा रहे हैं। समाज के चहुॅमुखी विकास में बच्चों का महत्वपूर्ण योगदान हेै, जिससे समाज की प्रगति व विकास सम्भव है, षिक्षा के अभाव के कारण छोटे-छोटे नौनिहालों का भविश्य दांव पर पर लगा है, जिससे बच्चों का षारीरिक व मानसिक विकास खत्म होता जा रहा है,जो सामाजिक जागरूकता के बिना अधूरा है। एक बच्चे का भविश्य पुरे राश्ट्र को मजबूती दे सकता है, भीख व नषे की लत बच्चों को चोरी करने को मजबूर कर देता है,जो समाज के लिए बहुत नुकसान दायक हो रहा है, यदि समाज का सामाजिक परिवेष मजबूत होता तो छोटे-छोटे हाथों से खेलने वाले बच्चे कभी हाथ में कटोरा लेकर कभी भीख नहीं मांगते, नषे और भीख की इस लत ने बच्चों को हर गलत कार्य की तरफ धकेल दिया है, नषे के कोरोबारी अपनी मोटी कमाई से, स्वंय इस देष को बर्बाद करने में तुले हुए हेैं, बच्चों की वास्तविक जिन्दगी भीख और नषे से दूर तभी हो सकती है,आज कुढ़े के डेर में कबाड़ चुनते बच्चे हर सरकारी योजनाओं को चुनौती दे रहे हेेंै। उनकेे माता-पिता भी स्कूल भेजने की जगह उन्हें सुबह कुढ़ा चुनने के लिए रवाना कर देते हैं। जिससे ये स्कूल नहीं जा पाते हमारी सरकारी योेजनायें सब मिट्टी में मिल जाती हेैं। जिससे साफ पता चलता है कि आज भी ये बच्चे षिक्षा की बुनियादी सुविधाओं से दूर हेैं। सत्ता और व्यवस्था परिवर्तन के बाद भी इन तमाम नौनिहालों की तकदीर नहीं बदली,गरीब परिवारों के बच्चे आज भी बस्ते की कंधो पर आजीविका का बोझ झेल रहे हेैं। कापी किताबों से नाता तोड़ कर रोजना दो रूपये की कमाई के लिए सड़कों पर भटकते रहते हेैं। निःषुल्क अनिवार्य षिक्षा बाल षिक्षा अधिनियम की राह में एक बड़ी चुनौती है। 10 फीसदी बच्चे भी कक्षा पांच तक की षिक्षा भी ग्रहण नहीं कर पाते बालश्रम विरोघी सख्त कानून ,सर्वषिक्षा अभियान व षिक्षा अधिकार अधिनियम सभी उपरोक्त सच्चाई के सामने बौने साबित हो रहे हेैं। छः वर्श के अधिकांष बच्चे स्कूल नहीं पहंुच पाते अगर दाखिला भी ले लें तो बहुत ज्यादा दिनों तक उनकी पढ़ाई नहीं चलती ये कुढ़ा बटोरने में अपना भविश्य तलाषते हेैं। यां अपने पेट के लिए घरों में झूठे बर्तन माजते, देखा जा सकता हेै।


जब समाज की एक पहल सही दिषा ंमें मुड़े जहां तक बच्चों के भविश्य का प्रष्न हेै, उनके षिक्षा व स्वास्थ्य को लेकर सबसे अधिक अध्ययन किया जाना चाहिए,अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए, जिससे समाज में बाल षिक्षा से बच्चों के उज्जवल भविश्य को सकारात्मक दिषा मिल सके। ऐेसे गरीब और असहाय बच्चों के लिए जिनके पास खाने की व्यवस्था नहीं हेै, भारत सरकार या राज्य सरकार द्वारा संस्थानों को उनके भविश्य का जिम्मा सौंप देना चाहिए। जिससे हर जगह पर बच्चों के भविश्य के लिए जोर दिया जा सके और हमारी सामाजिक पहल को देष की आवाज मिल सके।


प्रस्तुत अध्ययन हल्द्वानी तहसील के वनभूलपुरा पर किया गया। यह क्षेत्र रेलवे स्टेषन व बस स्टेषन से समीप है। प्रस्तुत अध्ययन क्षेत्र का चुनाव अध्ययनकर्ता के निवास स्थानीयता मंगल पड़ाव से निकटता के कारण किया गया ताकि समय धन व श्रम की बचत और समस्या से समाज जागरूक हो सके और अध्ययन के कार्य को निषिचत समय में पूरा कर बच्चों के लिए कुछ प्रयास किया जा सके । प्रतिदर्ष प्रस्तुत अध्ययन के लिए हल्द्वानी तहसील के वनभूलपुरा में 200 बच्चों का चयन किया गया। प्रतिदर्ष के चयन में उद्देष्यपूर्ण निर्दषन विधि का प्रयोग किया जाएगा। प्रतिदर्ष में केवल 3 साल से 14 साल तक के बच्चों को लिया गया। इस विधि का चुनाव तथा निकटता एंव जरूरत के कारण किया गया है। जिससे भीख मांगने वाले एंव नषा करने वाले बच्चों की संख्या का पता लगाया जा सके, और समय से इस भीख और नषे की महामारी को रोककर सामाजिक जागरूकता से सभ्य समाज को विकसित किया जा सके।समय से बच्चों को समाज और षिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने हेतु अथक प्रयास किया जा सके।षिक्षित समाज को और भी मजबूत बनाकर इन बच्चों की सहायता के प्रयास को सफल बनाया जा सके।


आंकड़ा संग्रहण करने के लिए साक्षात्कार अनुसूची मुख्य साधन के रूप में ली गयी। जिसके द्वारा भीख मांगने व नषा करने वाले बच्चों के आंकड़े एकत्र किये जाएंगे। साक्षात्कार अनुसूची में अधिकतर वस्तूपरक प्रष्न होंगे। प्रष्न छोटे एंव सरल रखे जाएंगे इस अनुसूची को लेकर चननित बच्चों से सम्पर्क स्थापित किया जाएगा। अनुसूची के साथ ही साक्षात्कार के द्वारा उनकी मनोवैज्ञानिक दषाओं का अध्ययन कर उन्हें अलग से नोट किया जायेगा। आर्थिक स्थिति एंव मुख्य समस्या को खोजकर समाधान करने की विधि का अध्ययन किया जायेगा। साक्षात्कार अनुसूची में दिये गए प्रष्न उद्देष्यों को ध्यान में रखकर तैयार किये जाएगे। अध्ययन में समस्त उद्देष्यों को पूरा करने में अनुसूची सीमित प्रांसगिकता से बंधी है, इसलिए आंकड़े संग्रह में अप्रत्यक्ष रूप से प्रेक्षण विधि का प्रयोग किया जायेगा ताकि षोध के विशय की सही-सही जानकारी प्राप्त हो जाए। ऐंसे अनेक मुद्दे जिनमें साक्षात्कार द्वारा आंकडे़ संग्रह करना कठिन है। उनके लिये प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रेक्षण की सहायता ली जाएगी। अध्ययन के लिए समय की बचत ओैर सही तथ्यों की जानकारी एंव सहीं आंकड़ों का ताल मेल रखा जायेगा। जिससे भविश्य में सभी लोगों को सही जानकारी एंव सही निर्णय लेने की क्षमता को जागरूक किया जा सकें। इसलिए समय को ध्यान में रखते हुए तथ्यों को उजागर किया गया है।


आंकड़ो का विष्लेशण साक्षात्कार अनुसूची द्वारा प्राप्त तथ्यों की जांच की गयी हेेै। तथा उनकी विषेशताआंे के आधार पर अलग-अलग समूहों में रखकर सूचनाओं के आधार पर विभिन्न कारणों का पता लगाया गया। प्रस्तुत अध्ययन में प्राप्त तथ्यों को क्रमबद्व करके विष्लेशण किया जायेगा। जिससे अन्य तथ्यों के साथ उसके पारस्परिक सम्बन्ध स्पश्ट हो सकेे। अध्याय योजना पहला अध्याय समाज में गरीब बच्चों की स्थिति से सम्बन्धित होगा, इस अघ्याय में भीख मांगने वाले व नषा करने वाले बच्चों का स्वास्थ्य व षिक्षा का स्तर कैंसा है, उनके भीख मांगने व नषा करने के कारण समाज में क्या प्रभाव पड़ सकता है, आदि का वर्णन किया जायेगा। दूसरा अध्याय अध्ययन की अवधारणा के ढांचे और अनुसंधान के डिजाइन से सम्बन्धित होगाा। अध्याय के लिए साहित्य की समीक्षा और चुने गए संस्थानों का विवरण भी इस अध्याय में षामिल किया जायेगा।


उपरोक्त अध्ययन का कार्य वींरागना संस्था के बाल चैपाल के कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। उपरोक्त विशय को चुने जाने का प्रमुख कारण बच्चों के भविश्य का भीख और नषे में खत्म होती जिन्दगी को बचाने से सम्बन्धित विशयों में मेरी रूचि का होना है। छोटे-छोटे बच्चों का भविश्य बर्बाद होने की समस्या का कारण बेरोजगारी,अषिक्षा,भीख और नषा है। जीवन में किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छी षिक्षा एंव स्वास्थ्य का होना आवष्यक है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक न होने के कारण गरीब तबके के बच्चों को सड़कों में भीख मांगने एंव नषे का सामना करना पड़ता है। मेरे अध्ययन कार्य का उद्देष्य न केवल बर्बाद होने बचपन से नहीं बल्कि भीख व नषेड़ी बच्चों के भविश्य को संवारने के लिए जागरूकता के प्रयास से एक नई पहल करना है। प्रस्तुत अध्ययन कार्य को सात अध्यायों में बांटा गया हैं, अध्ययन कार्य में वैज्ञाानिक पद्वति का प्रयोग किया गया है। अध्ययन कार्य को पूर्ण करते हुए इस बात का विषेश रूप से घ्यान रखा गया है कि इसमें वेैशयिकता एंव वस्तुनिश्ठता बनी रहे। विशय को सुबोध व व्यावहारिक बनाने के उद्देष्य से दण्डचित्रों का भी समावेष किया गया हेै। मार्गदर्षन तथा सुझाव आदि की सहायता के लिए अपने निर्देषक डाॅ0 गणेष सिंह रावत का आभार प्रकट करती हॅू। जिन्होने अपने बहुमुल्य समय व सुझाव देकर मुझे यह लिखने के लिए प्रेरित किया है। साथ ही मेंै अपनी वीरांगना टीम की सदस्य दीपा रौतेला का आभार प्रकट करती हॅूं। मैं अपनी माॅं श्रीमती माधवी बिश्ट आभार प्रकट करती हॅूं। जिनके आर्षीवाद एंव सहयोग से मेैं इस कठिन कार्य को सम्पन्न कर सकी। मै अपने पति श्री संदीप अरोरा का हृदय से आभार प्रकट करती हॅूं जिन्होनें मुझे पारिवारिक दायित्वों से मुक्त रखते हुए इस अध्ययन कार्य के लिए प्रोत्साहित किया,मुझे किसी बन्धन में न रखते हुए हर कार्य में मेरा सहयोग दिया और पाठन सामग्री एकत्रित करने में मेरा सहयोग दिया। मेैं विषेश रूप से पारिवारिक सदस्य योगेष रजवार जी का आभार प्रकट करती हूूूूूूूॅ, जिनके सम्पूर्ण सहयोग के कारण ही इस अध्ययन कार्य को वांछित सफलता मिल सकी। अन्त में,मेैं उन समस्त इकाइयों की भी आभारी हॅूं। जिन्होनें अध्ययन कार्य से सम्बन्धित सत्य सूचनायें देकर इस कार्य को पूरा करने में सहायता प्रदान की।


प्रस्तावना-भारत मेें आदि काल से ही दान देने की परंपरा चली आ रही हैं, दान मांगने पर कई दानवीरों ने अपने प्राण तक दान दे दिये जैंसे कर्ण,महर्शि दधिची,बलि,रघु,षिव और हरष्चिन्द्र। इन लोगों का नाम आज भी हमारे देष में आदर व सम्मान के साथ लिया जाता है, आज ओैर कल के दान देने में काफी परिवर्तन हो गया है। पहले के समय में कोई प्रजा अपनी राजा से दान मांग लेता था या राजा द्वारा प्रजा केा दान दे दिया जाता था। या संकट की घड़ी मंें जीवन दान भी दे दिया जाता था,लेकिन आज के समय में यह धीरे-धीरे एक व्यवसाय का रूप अख्तियार करता जा रहा हैे। हम मंदिरों या रेलवे या टेªन में ऐंसे तमाम लोगों से मिलते हैं,जो ना तो अपाहिज होते हैं,और ना ही भिक्षा पाने के पात्र होते हैं। लेकिन फिर भी उन पर किसी प्रकार का बहस न करते हुए हम उन्हें भिक्षा दे देते हें। कहीं-कहीं तो लंगड़ा व अंधा बनकर बच्चों के सहारे गीत गाते हुए भिखारी पूरी टेªन का सफर करते हुए मिल जाते हैं, उनके साथ एक छोटा बच्चा महज चार या पंाच साल का होता हैे,यदि बचपन से ही किसी बच्चे को ऐंसी प्रवृत्ति में पाला जाये तो, वह भिखारी मेहनत से ज्यादा पैंसा भीख में कमा लेगा, एक अनुमान से अनुसार केवल भारत देष में 3000 करोड़ सालाना भीख में लिया व दिया जाता है। समाज षास्त्रियों ने भिक्षावृत्ति को अपराध माना है। अब यह कानून के उल्ंाघन से जुड़ गया है। भिक्षावृत्ति खासकर बच्चों को काहिल बना रही हेै,तो कुछ बच्चे अपराध का रास्ता पकड़ने को मजबूर हो रहे हेैं। विभिन्न बाजारों मुहल्लों व धार्मिक स्थलों पर भिक्षा मांगते महिलाओं,पुरूशों व बच्चों का झुण्ड नजर आता है,जिसमें ज्यादातर अपात्र होते हैं, दीन-दुखियों अपाहिजों व अनाथों को दान देने की परम्परा पुण्य लाभ से जोड़ी गयी है,यही परम्परा अब समाज में कोढ़ बनती जा रही हेै,भीख मांगकर दाल रोटी चलाने की प्रवृति में कुछ महिलाओं व बच्चों में यह रास्ता अख्तियार करने में सहयोग किया है,दया भाव व पुण्य लाभ के चलते लोग भीखमंगों को दरवाजे से खाली हाथ नहीं जाने देना चाहते,लोगों की इस कमजोरी का फायदा कतिपय पेषेवर भिखारी अपने बच्चों से उठा रहे हेैं,कुछ तो नकली अपाहिज या बहूरूपिया बनकर लोगों को ठगने का काम करते है,पिछले एक दषक में नषाखोरी की लत देष के लिए ज्वलंत मुद्वा बनकर उभरा है। राश्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्श 2004 से वर्श 2017 तक लगभग 25,426 लोगांे ने नषाखोरी से उपजी समस्याओं के चलते आत्महत्या कर ली,यानि औसतन सात आत्महत्या रोज़ वर्श 2004 से 2014 के बीच इन मामलों में 149 प्रतिषत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।


पदार्थों का सेवन करते हैं। जो नषाखोरी की आदत के षिकार हो जाते हैं, इनके माता-पिता और वयस्क परिवारजन रोजी-रोटी के जुगाड़ में व्यस्त रहते हैं, और वे बच्चों पर कोई घ्यान नहीं देते हें, यहां तक कि 10 वर्श की उम्र में ही बच्चे स्कूल भी छोड़ देते और कचरा बीन व होटलों में बर्तन मल ,मजदूरी, फेरी लगाकर सामान बेचने का काम करने लगते हेैं, और वे अपनी कमाई से मादक पदार्थ खरीदने मंे सक्षम हो जाते हैं, बचपन इंसान की जिंदगी का सबसे हसीन पल, होता है।न किसी बात की चिंता और न ही कोई जिम्मेदारी होती है, बस हर समय अपनी मस्तियों में खोए रहना,खेलना-कूदना और पढ़ना, लेकिन सभी का बचपन एंेसा ही हो यह जरूरी तो नहीं। आज दुनिया भर में 215 मिलियन ऐंसे बच्चे हैं, जिनकी उम्र 14 वर्श से कम है, और इन बच्चों का समय स्कूल में काॅपी-किताबों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों,घरों उघोगों मे बर्तनों, भीख मांगने और नषा करने में बीतता है, यह स्थिति भारत में सबसे ज्यादा है, 1991 की जनगणना के अनुसार बाल मजदूरों का और भीख मांगने वाले बच्चो का आंकड़ा 11.3 मिलियन था। 2001 में यह बढ़कर 127 मिलियन हो गया,किसी भी षहर के चैराहे पर यह दृष्य बहुत आम सा है,गोद मंे दूधमुंहा उनींदा बच्चा, बच्चे के नाम पर भीख की गुहार लगाती धूल-ध्वसरित मां। निरंतर दुआएं देती व्यथित मां को देखकर हम चाहें ना पसीजे लेकिन अगर हम थोड़े भी संवेदनषील हैं, तो मासूम बच्चे अवष्य की हममें एक कसक छोड़ जाते हैं।एक साथ देष,देष का भविश्य और फिर अपने बच्चे के बारे में सोच कर हम सिहर उठते हेैं।यह वही देष हैं जहां बच्चों के नाम पर करोड़ों रूपये की योजना बनती है,बाल-दिवस पर मंचों से जोर-षोर से बताई जाती है,लेकिन पर्दे के पीछे का सच का सच जो कुछ चीख-चीख कर बताता है, उसे सुनने में यहां के सारे सत्ताधीस बधिर हो जाते हैं। पैंसो की भूख क्या इतनी उग्र होती है, कि हम उन गुलाबी अंकुरों की पेट की क्षुधा भी अनुभूत नहीं कर पाते?उन्हें नषा देने वाले हाथ कितने कठोर होंगे, जो एक बार भी कापें नहीं और एक काले कुचक्र का हिस्सा उन कोमल षिषुओं को बनाते रहे। भू्रण,हत्या,बाल श्रम ओैर योेैन-षोशण के बाद खुला यह स्याह सच संवेदना के स्तर पर कितने मन को भीगो सका मैं नहीं जानती लेकिन चाहती हॅॅूं। कि अगर एक बंूद आंसू भी इन मासूमों के लिए ढूलका हो तो अब कभी इन्हें देखकर कार के षीषे न चढें ओैर नषे का षिकार न हो इसके लिए अथक प्रयास होने चाहिए।


बच्चा पार्टी हंसते खिलखिलाते बच्चे बरबस ही हमारा ध्यान खीच लेते हेैंे। धनिक के बच्चे अपनी स्वस्थ्य खूबसूरत दमकते चेहरों की मासूमियत से तो निर्धनों के दयनीय मासूमियत से अनजाने ही बहुत कुछ कह जाते हैं। और अगर बच्चा किसी भिखारिन के गोद में हुआ तो हमारी करूणा संवेदना एक बच्चे के प्रति और बड़ जाती है, और यदि बच्चा अपाहिज अंधा ओैर जले कटे चेहरे वाला है तो हमारी संवेदना दुगुनी चैगुनी हो जाती है, अनायास ही हमारे हाथ या तो जेब में या फिर पर्ष से सिक्के ढुढने में मदत करने लगते हैं, आज भारत के अधिकाषं बच्चे भिक्षावृति या वैष्यावृति में लिप्त हेैं, बच्चे गरीब परिवार के होते हैं। जिनके अभिभावकों को पेंैसे देकर माफियावाद उनको खरीद लेता हेै। और उनकी तस्करी कर देता है नषे और भीख की अवधारणा जटिल है। इस अवधारणा को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में ग्रहण किया जाता है। सकारात्मक रूप से षरीर,मन और आत्मा के स्वस्थ होना ही मानवता हेै। जिसमें षारीरिक क्रिया कलापों पर विषेश ध्यान दिया जाता हेै। वे सभी लोग स्वस्थ्य माने जा सकते हैं। जो बीमार नहीं पड़ते या जिनमें कोई नकारात्मक लक्षण नहीं दिखाई देते नवयुवकों, किषोरों एंव बालकों में तस्करी एंव दुरूपयोग की असाधारण बढ़ोत्तरी गंभीर व जटिल निहितार्थ सूचित करती है। जो राश्ट्रीय स्वास्थ्य एंव अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करती है। इसकी रोकथाम राज्य के साथ-साथ समाज की सर्वोत्तम प्राथमिकता है। यहां एक खुला राज्य है,जो ड्रग/नषे ने निर्दोश बच्चों, नवयुवकों बालकों व महिलाअेां के ऊपर अपना भयानक षिंकजा कस लिया है, इसका इतना खतरनाक फैलाव जिससे प्रतीत होता है, कि नषे की सुरूवात 9-10 वर्श की किषोर आयु से हो जाती है। भारत में लगभग 7 करोड लोग पदार्थ दुरूपयोग में लगे हैं, जिनमें से 17 प्रतिषत लोग उसके आदि हैं। राज्य की कई एजेन्सियों के साथ-साथ गैर सरकारी संगठन भी नषीले पदार्थों की तस्करी और मादक पदार्थों के उन्मूलन के क्षेत्र में कार्यरत है, नन्हे नन्हें हाथ, जुबान पर कुछ निवालों की ख्वाहीष लिए भारत का विकास माने जाने वाले तमाम बच्च,े आज अपने विकास की दरकरार मेे दर-दर कहें या घर-घर भटकते हेैं, दरअसर भारत का एक हिस्सा आधुनिकता को जान और पहचान रहा हेै, और उसके साथ खुद को सेट करने की कोषिष भी कर रहा है। लेकिन उनका क्या जो आज भी लोगों में समृद्व की हल्की सी निषानी देखकर हाथ पसार देते हैं। भारत भले ही उम्र के हिसाब से विकास की ओर बढ रहा हो, पर आज भी महज पांच छहः और सात साल के बच्चे भीख मांगते हेंै, इन्हें देखकर जहन में सवाल खड़ा होता है, कि विकास के सवाल में इन्हें क्यों षामिल नहीं किया जाता है। सब जानते हेैं कि भारत में भीख मांगना अपराध की श्रेणी में रखा गया हेै, फिर भी देष की सड़कों पर लोगों के सामने इतने सारे हाथ केंैसे भीख और उम्मीद की ख्वाहीष करते हेैं, बरहाल ये सारी बातें, लेख,बहस कई बार आयोजित की गई, मंच सजे पर राजर्नैितक जुबानों पर इनका जिक्र नहीं था, क्योंकि उन्होने राजनीतिक का मतलब महज धर्म का बंटवारा,जाति मे मतभेद बनाए रखा है, लेकिन मुद्वा लाख टके का है। भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते,वे संगठित माफिया के चंगुल में फंसकर भीख मागने का काम करते हेै। वैंसे तो पूरा भारत इनकी गिरफत मंे है। लेकिन तमिलनाडु,केरल,बिहार,नई दिल्ली ओर उड़ीसा में ये एक बड़ी समस्या बना हुआ हेै, लगभग हर जगह ये मिल जायेगे, इनके हाथों में किताबों की बजाय कटोरा थमा दिया जाता है। मेवात के वरिश्ठ अधिवक्ता मोहम्मद मुुजीब खान,के अनुसार भीख मांगना सामाजिक बुराई और गंदी आदत है। समाज और प्रषासन को इसके विरूद्व सख्त कदम उठाने चाहिए। भारत में भीख मांगने की प्रवृति पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार षारीरिक रूप से तंदुरूस्त व्यक्ति को मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पालन करना चाहिए। इस्लाम में भीख मांगना जायज नहीं और जिस व्यक्ति के वाली-वारिस न हो उनको सहारा देना चाहिए। डाॅ गीता गुप्ता के अनुसार भीख मांगना किसी भी देष के लिए कलंक है। लेकिन हमारे देष में आज भी सार्वजनिक स्थलों पर भीख मांगते बच्चे आसानी से दिख जाते हैं, जो सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर प्रष्न चिन्ह लगाते हेैैं देष के कई जगहोें पर भीख मांगना आजीविका का साधन है।जिससे इंसान के भरण पोशण का रास्ता मिल जाता है। आज देष की सबसे बड़ी समस्या बाल भिखारियों की संख्या में बड़ोत्तरी है, जो देष के लिए व और देष के भविश्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता हेै। हर गली में षिक्षा का माध्यम तो है, लेकिन षिक्षा को प्रचारित नहीं किया जाता, षिक्षा जिस दिन देष की सबसे पहली जरूरत बन जायेगी, उस दिन देष का नागरिक स्ंवय ही आगे निकल जायेगा चाहे वह बच्चा हो या बुढ़ा हर इंसान मेहनत करना सीख जायेगा। यही संसार का नियम कहलाया जायेगा। और सांसारिक अनुभूति का विस्तार हर मन में लहरायेगा।


1-मानव तस्करी-मानव तस्करी भारत में सबसे ज्यादा होती हेै। भारत के राज्य ओर केन्द्र षासित प्रदेष 2012 में मानव तस्करी की घटनाओं के आधार पर क्रमित है, ओर अपराध-सिद्वि पर आधारित है। भारत मे सबसे ज्यादा तस्करी उत्तर प्रदेष,तमिलनाडु और केरल में होती है। नषीली दवाओं और हथियारों के कारोबार के बाद मानव तस्करी विष्व भर में तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है। दुनिया में 80 प्रतिषत से ज्यादा तस्करी यौन षोशण के लिए की जाती है, और बांकि बंधुआ मजदुरी के लिए, भारत को एषिया में मानव तस्करी का गढ़ माना जाता है। सरकार के आकड़ों के अनुसार हमारे देष में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता होता है। सन् 2011 में लगभग 35,000 बच्चों की गुमषुदगी दर्ज हुई जिसमें से 11,000 से ज्यादा तो सिर्फ पष्चिम बंगाल से थे। इसके अलावा यह माना जाता है कि कुल मामलों में से केवल 30 प्रतिषत मामले ही रिर्पाट किये गए और वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। मानव तस्करी मानव तस्करी भारत की प्रमुख समस्याओं में से एक हैे। आज तक ऐंसा कोई अध्ययन नहीं किया गया जिससे भारत में तस्कर हुए बच्चों का सही आंकड़ा पता चल सके, छोटी-छोटी उम्र की लड़कियांे को तस्करी हेतु नेपाल से भारत लाया जाता है। इस स्थिति पर भी मांग और आपूर्ति का सिद्वान्त लागू होता है। पुरूश काम करने के लिए बड़े व्यवसायिक षहरों की ओर पलायन करते हैं। जिससे व्यापारिक सेक्स की मांग पैदा होती है। इस मांग को पूरा करने के लिए सप्लायर हर तरह की कोषिष करता है। जिसमें अपहरण भी षामिल है। गरीब परिवार की छोटी लड़कियांे और युवा महिलाओं पर यह खतरा ज्यादा होता हेै। एक तरफ देष बेटी बचाने बेटी पढ़ाने की बात करता है। वही दुसरी तरफ मानव तस्कर बेटियों की तस्करी से अपनी तिजोरिंया भरता हेै। आज मानव तस्करी सबसे ज्यादा हो रही है। देष का कानून भी इनके लिए कुछ नहीं कर पा रहा है। नषीली दवाओं और हथियारों के कारोबार के बाद मानव तस्करी विष्व भर में भारत तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है। दुनिया भर में 80 प्रतिषत से ज्यादा मानव तस्करी यौन षोशण के लिए की जाती है। बांकि बंधुआ मजदुरी के लिए की जाती है। आज तक भारत में तस्कर हुये आंकड़ों का सही पता नहीं चल सका है। सामाजिक असमानता,क्षेत्रीय लिंग वरीयता,असंतुलन और भ्रश्टाचार मानव तस्करी के प्रमुख कारण हेैं। मानव तस्करों के खिलाफ यदि कढ़ी कार्यवाही की जाये तो इस समस्या को खत्म किया जा सकता हेै।साथ ही लोगों को उनके इलाके में अच्छी षिक्षा और बेहतर सुविधाएं देने की जरूरत है,जिससे मां बाप अपने बच्चों को इस तरह ना बेच सकें।इसके साथ ही लड़कियों और महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की जरूरत है। ं


-सिनेमा का प्रभाव- आजकल फिल्मों की हल्के मनोरंजन के साधन के रूप में गिनती नहीं होती,आज फिल्में हमारे हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गई है। बच्चे बूढ़े सभी फिल्मों की नकल करने की कोषिष करते हेैं। फिल्मों ने हमारे सामाजिक जीवन को विकृत कर दिया है। इसमें सुधार लाने के लिए सामाजिक उदद्ेष्य प्रधान फिल्मों के निर्माण की आवष्यकता हे। ऐंसी फिल्मी ऊबाउ नहीं होनी चाहिए,क्योंकि दर्षक वर्ग उनके प्रति आकर्शित नहीं होगा। इसलिए सामाजिक संदेष वर्ग उनके प्रति सामाजिक संदेष की फिल्में भी मनोरंजन से भरपूर होनी चाहिए ।मार्गदर्षन भी होना चाहिए आकर्शित नहीं होगा। हमारे सिनेमा जगत का नषाखोरी फैलाने में बहुत बड़ा हाथ हेै,टी0वी0 फिल्मों में खुलेआम षराब,सिगरेट,गुटखा खाते हुए लोगों को दिखाया जाता है,जिससे आम जनता विषेशकर बच्चांे और युवा प्रभावित होते हैं, और इसे अपने जीवन में उतार लेते हैं,टी0वी0 पर तो इसके बड़े बड़े विज्ञापन भी आते हैं, जिस पर हमारे देष की सरकार भी कोई कदम नहीं उठाती है। इससे जुड़े लोगों पर कभी भी आंच नहींे आती। इस मामले में कानून बनाने वालों और कानून तोड़ने वालों की हमेषा मिलीभगत रहती है। इन हालातों से निपटने के लिए सिस्टम को ज्यादा जवाबदारी निभानी चाहिए।‘फिल्मों में दिखाया जाता हेै कि कैंसे बच्चे चुराये जाते हैैं, या लाखों बच्चे गायब हो जाते हैं, वे भीख मांगने के अलावा अवैध कारखानों में अवैध बाल मजदूरी,घरों या दफतरों में नौकर,पोर्न उघोग,वेष्यावृति,खाड़ी देषों में ऊंट दौड़ अंग बेचने वाले माफिया, अवैध रूप से गोद लेने और जबरन बाल विवाह के जाल में फंसते हुये फिल्मों में दिखाया जाता है। युवा वर्ग देष का भावी निर्माता है, उन पर फिल्मों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए उन फिल्मों का निर्माण होना चाहिए,जिनमें मनोरंजन और मार्गदर्षन दोनों का सम्मिलित पुट हेै। हिंसा की भावना समाज की प्रगति में बाधक है। यदि सभी निराष युवक नायक की भांति कानून अपने हाथ में ले लेंग,े तो देष में जंगल षासन लागू हो जायेगा। युवा वर्ग के अति संवेदनषील मस्तिश्क को सामाजिक और नैतिक गुणों से भरपूर फिल्मों के माध्यम से योग्य नागरिक के रूप में तैयार किया जा सकता हेै। यही समय है जबकि फिल्म निर्माता अपने दायित्व को समझें और अच्छी फिल्मों का निर्माण करेें।


भीख ओैर नषा- चलते राह यदि कोई बच्चा भीख मांगता दिखता है, तो हम दया में आकर उसे भीख दे देते हैं। ताकि वह एक वक्त की रोटी खा सके, लेकिन यह हमारी गलत धारणा है, हमारा समाज षिक्षित होते हुए भी अषिक्षितों जैंसी हरकतें करता हेै। भीख बच्चे की मजबूरी है लेकिन सिर्फ नषा करने के लिए, यह बात हमें समझनी होगी। भारत में भीख माफियाओं का बहुत बड़ा उघोग है। इससे जुड़े लोगों को हालातों से निपटने के लिए सिस्टम को ज्यादा जवाबदारी निभानी चाहिए। जिससे पता चलता है कि बच्चों के साथ गलत है। अक्सर देखा जाता हेै, कि कुछ बच्चों को अपने घर परिवार के बारे में याद तक नहीं रहता, वे जान-बुझकर बताना नहीं चाहते कुछ घर से भागकर आते कुछ अपने घर की गरीबी या पिता की षराब खोरी की वजह से भीख मांगने को मजबूर थे। एक बात सब में समान थी कि वे भिखारी माफिया जिसे वे ‘दादा‘ कहते थे, बहुत डरते थे। भीख मांगने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था,क्योंकि नषा उनको हर गलत काम करने में मदत करता था, जेेैसे एक दुध पीता बच्चा अपनी माॅं के लिए तरसता ह,ै और मां अपने रोजी रोटी के लिए उसे नषे का आदी बना देती है। दुध पीते बच्चे को नषा देकर सुला दिया जाता है, जिससे वो कढ़ी धूप में रोये ना और लोग आसानी से इन मांओं को भीख दे सकें, ये बच्चों की जिन्दगी के साथ अन्याय है। आई0टी0 हब के नाम से जानी जाने वाली कर्नाटक (कीक)राजघानी बैंजूरू में हजार से भी ज्यादा बच्चे नषा देकर भीख का माध्यम बनाये जाते है। भीख मांगने वाली महिलायें इस नषे का षिकार बनाए बच्चों को घंटे के हिसाब से किराए पर लेती हैं। दुघमुंहा बच्चा नषे का षिकार इन फूल से कोमल बच्चों की उम्र मात्र 2 माह से 2 साल तक के मासूमों को 24 घंटे नषे की हालत मे रखा जाता हैं। तमतमाती धूप में या भूख से बिलबिलाकर बच्चे रोए या तड़पें नहीं, इसलिए इनको होष में लाने में घंटो लग जाते हैं। ये भीख मांगने वाले बच्चे नषे को अपना सब कुछ समझते उनके बिना उनको ना तो नींद आती बल्कि कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हर साल करीब 10 लाख बच्चांे के अपने घरों से दूर होकर अपने परिजन से बिछड़ने का अंदेषा है। उन बच्चों में से काफी बच्चे भीख के धंधे में झोंक दिये दिये जाते हेैं। इन बच्चों का जीवन एंेसी अंधेरी सुरंग में कैद होकर रह जाता हेै, जिसका कोई दूसरा छोर नहीं होता। इनसे जीवन की सारी खुषियां छीन ली जाती है। बाल अधिकारों के एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेष का कहना है कि, पर कभी भी आंच नहींे आती। इस मामले में कानून बनाने वालों और कानून तोड़ने वालों की हमेषा मिलीभगत रहती है। आजीविका के साधन आजीविका के साधन-बच्चों की आजीविका के साधनों में कुढ़ा बिनना सबसे सरल होता हेै।जिसके लिए बच्चे अपना स्कूल तक छोड़ देते हैं। कुढ़े का थैला इनको हल्का लगता है। क्योंकि इससे पेट की भूख खत्म होती है। लेकिन स्कूल का बैग इनके लिए बोझ होता है।खाली पेट षिक्षा से ज्यादा महत्पूर्ण है। सुबह खाली पेट कूढ़ा बिनने निकल जाते हैं।ताकि दिन भर में षाम तक रोजी रोटी का इंतजाम हो सके।और इनकी जिन्दगी की गाड़ी चल सके,इनके सुनहरे सपने कुढ़े में सिमट कर बिक जाते हैं। यदि इनके लिए षिक्षा के साथ-साथ रोजगार का भी इंतजाम हो तो यह बच्चे सबसे मेहनती और अच्छे बन सकते हैं।जिससे देष को तरक्की का एक नया नजरिया मिल जाता है। संगठित माफियावाद - भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते।वे संगठित माफिया के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। तमिलनाडु,केरल, बिहार, नई दिल्ली और ओडिषा में यह एक बड़ी समस्या है। हर आर्थिक पृश्ठभुमि के बच्चों का एंेसा हश्र होता हैे, इन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबों की जगह भीख का कटोरा आ जाता है। बाल अधिकारों के अधिकांष बच्चे देष की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में तो अदृष्य श्रमिक रूप मंे कार्यरत है। ंभीख मांगते बच्चे तिजोरी भरते माफियां जिस तरह से देष के बच्चों की स्थिति को माफिया बर्बाद कर रहे हैं, जिन्दा रहना एंव विकसित होना हर बच्चे का मौलिक अधिकार हेै। इसकी पूरी जिम्मेदारी राज्य पर है, हर राज्य इसके लिए नैितक रूप से बंधा है। राज्य को हर बच्चे के जीवन और विकास को निषिचत करना चाहिए।


 भीख माफिया और बच्चे सोशल मीडिया मोबाइल और सोषल मीडिया का असर-आज हम आंखिर मानवता के किस मुहाने पर आ खडे़ हुए हैं? बर्बरता और निर्ममता के कौन से युग की बात हेै यह? जहां टैक्नोलाॅजी ने इस कदर पैर फैलाए हैं। कि देष के कोने-कोने में चाहे पीने का पानी मुहैया ना हो मगर मोबाइल हर हाथ में है। जहां हर आम आदमी इंटरनेट के माध्यम से राश्ट्रीय मुद्वों के पक्ष या विपक्ष में स्वर बुलंद करता है? जहां ब्लैकबैरी और एप्पल जैंसे नाम अब अपिरिचित नहीं रहे है? सकारात्मक भूमिका अदा करने वाला सोषल मीडिया हर इंसान की जरूरत बन गया है। किसी भी अच्छे या बुरे कार्य का प्रचार-प्रसार मोबाइल में सोषल मीडिया के माघ्यम से होता हेै। इससे बच्चों के भविश्य पर काफी असर देखा जा रहा है।आजकल बच्चे इसके माध्यम से बोलना,हंसना,काफी कुछ सीखतेें हैं। उनके अंदर विचारों का आदान-प्रदान भी सोषल मीडिया से ही हेै।यदि सोषल मीडिया का सही सदुपयोग किया जाय तो हर बच्चे की जिन्दगी बन सकती हेै। समाज आज आंतकवाद से लेकर षांतिदूत की स्थापना तक इसी से करता है।जिससे समाज में आज हर चीज की जानकारी सोषल मीडिया से ही मिलती है। सही समय पर सही कार्यों की जानकारी और विष्वास की पहल ओैर लोगों का अटूट विष्वास का साधन बन गया है।समय- समय पर बच्चों के भविश्य की जानकारी बाल-भिखरियों की योजनायें यदि इस पर इस्तेमाल की जाये और हर सामाजिक इंसान इनके लिए रास्तों को खोजे तो कहीं न कहीं समाज को हम सही दिषा में ले जाने का प्रयास कर सकते हैं। यह वही देष हेै जहां बच्चों के नाम पर करोड़ों रूपये की योजना बनती है, बाल दिवस पर मंचों से जोर-षोर से बच्चों के भविश्य की योजनायें बताई और समझायी जाती है, लेकिन पर्दे के पीछे का सच जो कुछ चीख-चीख कर बताता है, उसे सुनने में यहां के सारे सत्ताधीष बधिर हो जाते हैं। यह मात्र उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि समस्त संसार की स्थिति का हाल है। 5-षारीरिक अपंगता- षारीरिक अपंगता एक ऐंसा कारण है जो षरीर से अपाहिज इंसान किसी मेहनत या भागदौड़ वाला काम नहीं कर सकता। लिहाजा वह अपने जीविकोपार्जन के लिए भीख मांगने का आसान सा रास्ता चुन लेता हेै। ऐंसें लोग अपनी विकलांगता को ईष्वर का श्राप दिखाकर समाज की संवेदना और सहानुभूति के हकदार बनने की कोषिष करते है,ं साथ ही उन्हें आमदनी का जरिया बना लेते हैं। जिससे ऐंसे इंसान नषे को ओैर मजबूती से अपना लेता है, जो समाज का फाइदा उठाकर नषे को बढ़ावा देने में सहयोग करता है।विकलांग इंसान भी खुद की ही नहीं दुसरों की सहायता भी कर सकता हेै।लेकिन एंेसे लोग दुसरों की भावनाओं के साथ मजाक कर खुद मजाक के पात्र बन जाते हैं। विकलांगता बुरी नहीं आज समाज की हर पीढ़ी सहयोग करने को तैयार रहती है।लेकिन कुछ लोगों ने भीख् को अपना धंधा बना लिया है,जिससे लोगों का भरोसा दान देने से उठने लगा है।  महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता और एक दुसरे की सहायता का प्रयास हिन्दू और मुसलिम महिलाओं को स्वरोजगार के हुनर सिखाना और महिला षक्ति की ताकत को उपयोग करने के लिए महिलाओं को स्वंय सहायता समूह के जरिये सरकार की नीति को बताना हर षनिवार बनभूलपुरा हल्द्वानी में रात 9.00 बजे के समय वहां की साारी महिलायें अपनी समस्याओं को लेकर वहां एकत्रित होती है। जिससे वहां के पार्शद द्वारा सहायता हेतु सुंझाव दिये जाते है।और उन सुझावों में पुरे सप्ताह कार्य किया जाता है।मैने देख की महिलायें अपने बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए भेजने के बजाय काम करने के लिए लगा देती है। ताकि वह बच्चा दो पैंसा लाकर घर में दे फिर चाहे वह कुछ भी काम करे।लेकिन माता-पिता के लिए बच्चों की षिक्षा सबसे जरूरी होती है।इस बात को लेकर हमेषा इनके बीच जाना होता है। यदि वह गरीब है तो उनके लिए षिक्षण सामग्री एकत्रित करनी होती है।बेटियों को षिक्षा के लिए प्रेरित करना हमारी प्राथमिकता होती है।क्योंकि मुसलिम समुदाय मे बेटी कम षिक्षा ग्रहण करती है।जिससे वह अपने कार्योें में जानकार नहीं हो पाती और आये दिन अपने परिवार के लिए अज्ञानी मोहरा बनकर रह जाती है।और अपने परिवार को सक्षम दिषा की तरफ नहीं ले पाती और आये दिन हर घर में लड़ाई झगडे़ होते है।ना समझी के कारण बर्बादी की कगार में चले जाते हैं।जब तक हम मजबूत नहीं होंगे तब तक हमारा समाज कमजोर रहेगा। इसके लिए हर महिला को षिक्षा की तरफ ले जाने का प्रयास हमेषा जारी रहेगा।चाहे उसकी उम्र कुछ भी हर तरह से षिक्षा के लिए प्रयासरत रहना चाहिये। हम षिक्षित तो हमारा समाज षिक्षित तभी हम अपने रोजगार को चलाने के लिए सक्षम हो सकेगें। महिलायें आज हर दिषा में अपना किरदार निभा रही हैं लेकिन कुछ महिलायें अपने घर तक सीमित रहती हैं। ओैर अंधेरों के बीच जिन्दगी का बखान करने लगती है।सकारात्मक दिषा हर महिला को बदल देता है। जिससे हर परिस्थिति को वह खुषी से निपटा कर अगे चलने लगती है।यदि हर पढ़ी लिखी महिला हर निरक्षर दुसरी महिला को सहारा दे तो षायद ही इस दुनिया में कोई महिला दुखी हो।हम आपस में ही एक दुसरे से ईश्या करते हेैं।इन बातों का फाइदा दुसरा पुरूश उठाकर आगे निकल जाता है।इस तरह जो भी महिला मेरे सम्पर्क मेैं आती है।उसे सही दिषा और सही राह दिखाना मेरा मकसद होता है।जिससे वह संसार के हर कोने जिन्दगी जीत कर निकले और हमारा समाज व देष प्रगति के पथ पर चले।नारी सम्मान की लडाई के लिए लड़ना बहुत आसान होता है,लेकिन आज तक कोई भी सरकार इस सम्मान की लड़ाई नहीं लड़ सकी है।भले ही इस चिंगारी से कई सरकारें आती और जाती हैं ,परन्तु आज तक महिलओं को कभी सामाजिक सम्मान नहीं मिला,क्योंकि धरेलू हिंसा की मार झेलने वाली महिलायें आज भी अपने हकों को नहीं ले सकी हेैं।आवाज उठते ही मार दी जाती हेै।जिसके लिए हमारी सरकारें कुछ नहीं कर पाती,कभी जिन्दगी की लड़ाई में अपनों से ही मात खा जाती हेैं।  अमर उजाला रत्न से सेवा के क्षेत्र में सम्मान सेवा के क्षेत्र में उस समय नैनीताल जिले से केवल चार लोग सम्मानित हुये थे। पर्यावरण के क्षेत्र में रेवती काण्डपाल जी, दृश्टिबाधित बच्चों की सेवा में श्री ष्याम सिंह धानिक जी,षिक्षा के क्षेत्र में प्रो0 श्री संतोश मिश्रा जी,सेवा के क्षेत्र में श्रीमती गुुजंन बिश्ट अरोरा यह सम्मान हमको कर्ज से झुका देता है कि अब सेवा और अच्छी तरह करनी चाहिये ,समाज ने हमको सेवा के लिए चुना हैै। तो यह समाज ही हमको आषीर्वाद देता है।  गदरपुर में स्कूली छात्रों के साथ अपनी सेवा का संचार और अनुभव का प्रचार सेवा के क्षेत्र में मेरे द्वारा जो भी अनुभव लिये सब बातों को संचारित करने के लिए गदरपुर की पर्यावरण संस्था द्वारा अपनी सेवा को बच्चों के बीच अनुभव साझा करने का मौका मिला ।जिससे बच्चों के मन में षिक्षा के साथ-साथ सेवा की अलख जगे और हमारा समाज षिक्षा के साथ सेवा के लिए भी तत्पर रह सके।क्योंकि यही वो भावी बच्चे हैं जो समाज में अपनी पहचान छोड़ने के लिए षिक्षा ग्रहण करते है।बिना सहयोग के इनको दिषा नहीं मिल पाती ये दिषा अन्य विषेशज्ञों द्वारा समय-समय पर मिलते रहे तो। इंसान वास्तविकता से कभी हार नहीं मान सकता।यही उम्र होती है,जब हमारे समाज का युवा कुछ नया करने का जज्बा रखता है।और एक नई सोच के साथ सामाजिकता को बदलाव देने का प्रयास करता है। स्कूल के बच्चों में ये नषाखोरी संगति के चलते फैलती हे, कम उम्र में ये बच्चे भटत जाते हैं, और उेसे लोगों के साथ संगति करते हेै,जो नषा को अपना जीवन समझते है, बच्चों के अलावा युवाओं को भी कई बार संगति ही बिगाड़ती है, युवा पीढ़ी के कई दोस्त होते हैं, जो नषा करते हैं, ओैर देखा देखी में इसके आदि हो जाते हैं, और साथ वालों को भी नषा करने के लिए प्रेरित करते हेैं, हमारा समाज यदि नकारात्मक और स्वार्थी है तो आने वाली युवा पीढ़ी का भविश्य भी नकारात्मक होगा। यह बात उस घृणित और कुत्सित प्रवृत्ति की है जो अपने ही आने वाले कोमल-कच्चे भविश्य को छलने में षर्म या झिझक महसूस नहीं करती? इंसानियत जैंसे लफज कितने बेमानी हो जाते हैं। जब बैंगलूरू जेंैंसे राज यूं खुलकर एक दर्दनाक तथ्य बनकर सबको अधिर कर जाते हेैं। हम मानव जो फूल,पत्ते,तितली,पंछी और चींटी के प्रति भी दयालु हो उठते हेेैं। क्या हमारे ही बीच का एक वर्ग इतना जालिम हो सकता है, कि इंसान के बच्चों को भी जानवरों की तरह इस्तेमाल करें? विकास का सम्बन्ध केवल कल-कारखाने,बांधों और सड़कों के बनाने से नहीं है, बल्कि इसका सम्बन्ध बुनियादी तौर पर मानव जीवन से है जिसका लक्ष्य है लोगों की भौतिक, सांस्कृतिक और आधात्मिक उन्नति। बीसवीं सदी के लिए भारत को अपनी तैयारी को सत्य साथ ही एक महाषक्ति के रूप में अपने आपको स्थापित करने के लिए पूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को प्राप्त करना अत्यावष्यक है। आज समाज केवल अपने से मतलब रखता है दूसरे के साथ क्या हो रहा है किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है।  नषे के लिए सारा दिन कुढ़ा बिनते बच्चों के भविश्य की चिंता आज भी हर साल स्वतंत्रता दिवस पर जब राश्ट्रीय ध्वज फैलाने हमारे देष के प्रधानमंत्री दिल्ली केैनाट प्लेस पर पूरे राश्ट्र को सम्बोधित कर रहे होते हैं। तो उस समय पुरी दुनिया की निगाह राश्ट्र ध्वज की तरफ होती है, और उसी जगह के आस पास देष का भविश्य नषे की हालत में सो रहा होता है, अफसोस की हमारे देष में हर जगह आज देष का भविश्य अधर में लटक रहा है, क्या देष का सोता भविश्य देष की मुख्यधारा का हिस्सा बन सकेंगे या हाषिए पर रहना उनकी तकदीर बन गया है, जहां एक तरफ भीख मांगता बचपन सिमट रहा है, वहीं दुसरी तरफ नषे की लत ने बच्चों का बचपन खत्म हो गया है, भारत में 20 लाख से अधिक लोग नषा करते हैं। तो कुछ नषे को तेजी से बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। भीख और नषा देष को मजबूती से जकडे़ हुए हैं, नषे की लत की वजह से देष का भविश्य षिक्षा एंव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है. देष का विकास बच्चों के भविश्य पर निर्भर होता है बच्चे नषे से सुरक्षित नहीं हैं ,बच्चे सुरक्षित नहीं तो कोई इंसान सुरक्षित नहीं आज देष का भविश्य नषे में पूरी तरह सिमटकर खत्म होता जा रहा है, एक विकसित देष के निर्माण में बच्चों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान हेै, जहां एक तरफ बड़ेे घरों के बच्चे अपनी षान ओ-षोकत के लिए नषे की तरफ जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब और अनाथ बेसहारा बच्चे एक वक्त की रोटी के लिए भीख मांगकर नषे की तरफ बड़ते जा रहे हैं। प्राचीन काल की पीढ़ी षिक्षा ग्रहण करने के लिए मीलों दूर जाकर परिश्रम करते थे, लेकिन आज की पीढ़ी नषे,चोरी व भीख के लिए समाज को खोखला कर रहे हेेैं, देष के लिए महत्वपूर्ण धरोहर बच्चे हैं उनकी देखभाल और चिंता करना हमारी जिम्मेदारी हैं।मेैंने देखा की 20 रू0 के ट्ूयूब को हासिल करने के लिए सारा दिन कुढ़ा बिनते हैं,वहीं दुसरी तरफ कुछ हार्डवेयर व्याापारी इन बच्चों को नषे का सामान देकर अपने बच्चों को पाल रहे है। हल्द्वानी हार्डवेयर स्टोर से तमाम नषे का सामान बरामद किया,और व्यापारी पर केष कर 10,000रू0 का जुर्माना लगवाया। जिससे अन्य लोग बच्चों को नषा न दे सकें।कुछ समय तक हल्द्वानी के तमाम हार्डवेयर की दुकानों में नषे का सामान बन्द हो गया, इस तरह कुछ हद तक आज भी नषे का सामान बच्चों को कम दिया जाता है।  प्राईमरी पाठषाला वनभूलपुरा हल्द्वानी मैं हर समुदाय के बच्चों के बीच पन्द्रह अगस्त की खुषी। देष आजादी की जष्न हर दिषा मे मनाता है। लेकिन हम पारिवारिक या नौकरी पेषा वाले होकर झण्डे के नीचे आर्षीवाद लेने भूल जाते है। अपनी आजादी का दिन भूल कर दुनियादारी मे ंलग जाते है। लेकिन में स्कूल के बीते दिनों की याद कर,झण्डे के पास खड़ा होना कभी नहीं भूलती इसलिए आजादी का हर दिन अपना बचपन याद कर बच्चों के लिए अपने वेतन से फल और मिठाई ले जाना कभी नहीं भूलती, बच्चों की प्रतिभाओं में षामिल होकर उनको आजादी की लड़ाई के बारे में बताकर उनके अन्दर देषभक्ति जगाने का काम करती हॅूं,और हर सहयोग के लिए उनको तैयार करती हॅॅू।जिससे अमन और चैन से हर इंसान जिन्दगी गुजारने के लिए एक दुसरे के साथ चल सके। आज हमारे बच्चे हिन्दू मुसलिमवाद मे उलझते जा रहे हैं, उनके बीच भेद-भाव की लकीर बचपन में ही उनके अनपढ़ माता-पिता द्वारा खींच ली जाती है। जिससे वो अपने ही देष के झण्डे के खिलाफ खडे़ होकर विरोधी देषों का नारा लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं।और अपने देष का झण्डा फैलाने से कतराने लगते हैं। बच्चों के मन में मानवता और भाईचारा हमेषा बनाये रखने के लिए हमेषा उनको अपनेपन का सहारा देना जरूरी होता है। यही सोचकर मेैं हमेषा उनके लिए कापी,किताब,बैग,जुते देकर उनको सहारा देने का प्रयास करती हॅूं।जिससे इनके मन में हर धर्म के लिए प्यार और साहस का संचार हो सके।कि वह भी हमारी तरह सबकी सेवा का संकल्प लेकर आगे बढ़े और मानवता का विष्वास कायम रख सके, एक दुसरे पर भरोसा कर इंसानियत को जिन्दा रख सके,और गलती मेें एक दुसरे को माफ कर आजादी की अच्छी जिन्दगी जी सके,विष्वास की डोर हम ही कमजोर करते है। वरना बच्चे तो फूल होते हेैं।जो नाजूकता से बिखर जाते हैं।इनको प्यार और खुषी से षिक्षा की तरफ ले जाने का मेरा मकसद होता है। जिससे ये हमारे देष का नाम रोषन कर सके।और भारत माता के नारों से विष्व में अपना परचम लहरा सकेें।  सर्व षिक्षा अभियान के तहत हर बच्चे को स्कूल जाने का अधिकार है। हल्द्वानी रेलवे स्टेषन में रहने वाले सारे बच्चे कुढ़ा बीनते हैं, भीख मांगते हेैं।इनके लिए धरोहर संस्था से सम्पर्क कर उनको चिन्हित कर स्कूली षिक्षा का प्रयास करते हैं। इन बच्चों कि लिए सप्ताह में एक बार बाल चैपाल लगाकर खेलकूद और षिक्षा के जरिये सकारात्मक दिषा की तरफ ले जाने का प्रयास करती हॅूं। छुट्टी का यह दिन सिर्फ दो घंटा बच्चों की जिन्दगी बदलने का प्रयास कहलाता हैं। सभी बच्चों से मेरी अच्छी पहचान हो गयी है।भीख को बन्द करने के लिए प्रयास किया जा रहा है। बच्चों को मारे पीटे बिना उनकी तरह बच्चा बनते हुये।उनको अपनापन देकर उन्हें भीख की जद से बाहर निकालने का मेरा यह प्रयास काफी हद तक सफल हो रहा है।जहां मिलते हैं वही हाथ पकड़कर बातें कर उनका दिल जितना इतना आसान नहीं होता।उनके दिल तक एहसास को महसूस करने वाले ही उनकी सोच तक पहुंच पाते हैं जिसका कहना वह मानने लगे।  बाल भिखारीयों की जिन्दगी से रूबरू होते मंत्रीगण यह छोटा सा बच्चा नरेन्द्र जिसके भविश्य की चिंता मुझे हमेष रहती है।यह बहुत होनहार है। लेकिन इसके माता-पिता की लापरवाही से यह भीख मांगने में मस्त रहता हेैं उस भीख से अपने खाने पीने की चीजें खरीदता है। और कुछ नषेड़ी बच्चों को देता है जिससे वह सब बच्चे इसका दुरूपयोग करते हैं। यह मेरे पास अक्सर घर पर आकर पढ़ता हेैै। हाल ही मेें धरोहर संस्था में यह समाज कल्याण मंत्री श्री यषपाल आर्या जी से मिलकर अपनी कलाकारी को पेष कर साबासी हासिल करता है । और सबका मनमोह लेता है। समाज की लापरवाही की वजह से आज देष का भविश्य अध्ंाकार में डुब रहा हेै, अपने फर्ज को निभाते हुए हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम समाज में छोटे बच्चों को कभी भीख ना दें ओैर न उन्हें नषे के लिए प्रेरित करें तो स्ंवय ही हमारा समाज एक नई दिषा की तरफ ले जायेगा। समाज में अक्सर वर्तमान में लोगों को भीख न देने 80000 पम्पलेट बांटकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जिससे वर्तमान समय में हल्द्वानी षहर में बच्चों का भीख मांगना बंद हो गया है, साथ ही हल्द्वानी षहर में लावारिस औार विक्षिप्त लोगों के रहने और उनको सुरक्षित स्थान आषादीप के सहयोग से नई जिन्दगी देने का कार्य करना मेरी प्राथमिकता हेै। बचपन बचाओ के नाम से फेसबुक पेज देख सकते हैं। ओैर बाल-चैपाल यूटूयब में देख सकते हैं, आपने बच्चों को भीख मांगते देखा होगा कभी हम उन्हें कुछ दे भी देते होंगेे, तो कभी डांटकर आगे बढ़ जाते होंगे। पर क्या कभी हमने यह सोचा है कि इन बच्चों की दुनिया कैंसी है? ये अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तरह क्या स्कूल जाना चाहते हेेैं? ये अपनी मर्जी से भीख मांगते हैं या इनसे मंगवायी जाती है? भीख में मिले पैंसों से ये क्या करते हेैं, क्या कभी इन्होंने भीख मांगना छोड़कर कुछ और करने के बारे में सोचा है? बड़े होकर ये क्या करेंगे, यदि समाज अपनी पीढ़ी को यह सोचकर पैदा करें, तो कि हमारी पीढ़ी कभी गलत रास्ते पर न चलकर सही कदम चलेगीह और हमारा योगदान समाज की भलाई और विकास होगा तो षायद हमारे रास्ते हमेषा सही दिषा में होंगे समाज की हर बुराई को हटाने में हमारा योगदान बराबर का होना चाहिए। जिससे भारत एक विकसित देष की श्र्रेणी में आने में सक्षम हो सके और हमारा राश्ट्र एक संगठित राश्ट्र बन सके कल्पनायुक्त भारत का चित्र उकृश्ठ चित्रों में षामिल हो सके। विष्वसनीयता बनी रहे समाज जागरूक होगा तो सत्ता भी जागरूक होगी, हमारे अधिकारों का कभी हनन नहीं हो सकेगा। जिससे समाज में बदलाव की स्थिति पैदा हो जायेगी,और हम अपने देष को एक विकसित देष में षामिल कर सकेंगे।

बेटी जीवन का आधार है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अन्तर्गत सारी सुविधायें बेटियों को नहीं मिल पाती धरातल पर कहीं भी कोई इनके लिए कार्य नहीं करता चार दिल अभियान से इनकी जिन्दगी को तमाषा बनाकर हर इंसान बेटी की स्ववंत्रता से खेल रहा है। जहां बेटियों को उनके अधिकार मिलने चाहिये वहां इनके लिए कोई कार्य नहीं होता षोशण अत्याचार अषिक्षा, हिंसा की पुतली बनकर रह गयी हेैं ऐंसे मेें मैने इनकी षिक्षा का बेड़ा उठाया और आज 50 बच्चियां मेरे साथ स्कूल चलो का नारा लेकर चलती है। जो स्कूल छोड़ चुकी हैं या स्कूल नहीं जा पायी या उनके परिवार वाले उनको स्कूल नहीं जाने देते थे ऐंसे बच्चे अक्सर मेरे पास आते हैं इनके लिए हमेषा मेरा सकारात्मक रवैया रहता है। जिससे यह आज खुद के लिए जीने का प्रयास कर रही है। और भीख की दुनिया से निकलकर उड़ान की तरफ निकल पड़ी है। अपने वेतन से गरीब लड़कियां जो स्कूल नहीं जा पाती उनकी पढ़ाई की सारी जिम्मेदारी उठायी है। समाज में बाल भिखारियों को षिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने हेेतु वह लगातार प्रयासरत हेैं। जो समाज में बाल चैपाल के नाम से जाना जाता हेै। बाल चैपाल उन बच्चों का समूह है जो अपनी जिन्दगी से ंभटकते जा रहे हैं। और षिक्षा,मानवता से दूर रह कर खुद को नषे की तरफ ले जा रहे हैं। और जिसमे मानव तस्करी बाल षोशण ,देह व्यापार घटनायें बच्चों के साथ हो रही घटनायें उत्तराखण्ड ही नहीं पुरे देष के लिए खतरनाक साबित हो रहे हेैं। राश्टीय बालिका दिवस के कार्यक्रम में बेटियों को जागरूक करने हेतु बताया गया कि में इस देष लिए एक मिषाल है।बेटी जो समाज को नई दिषा देने का काम कर रही हैं।सामाजिक ,राजनैतिक,पारिवारिक,आर्थिक,चाहे कोई भी क्षेत्र हो सब जगह बेटी का परचम लहरा रहा है। जरूरत है तो सिर्फ मानसिकता बदलने की जो हर दिन षर्मनाक होते जा रहे हैं।पुरूश प्रघान समाज में महिलायें हमेषा मात खा जाती हेैं लेकिन प्राचीन समय में भी महिलाओं का वर्चस्व सर्वव्यापी था। और हमेषा रहेगा। इसका जीता जागता उदाहरण है श्रीमती इन्द्रागांधी जो देष की पहली प्रधानमंत्री बनी और राजनैतिक की सबसे ताकतवर कुर्सी पर विराजमान हुई। और देष की बागडोर अपने हाथों में लेकर समाज को दिखाया कि वह देष को अपने बल बुते पर अपनी सोच और ताकत से चला सकती है। 24 जनवरी को राश्टीय दिवस के रूप में बनाया जाता है।इस दिन को याद करते हुए हमेषा दुनिया को दिखाया जाता है कि महिला भी देष का प्रतिबिम्ब है और हमेषा समाज को आईना दिखाने का काम करना उसकी सबसे बड़ी ताकत हैै।इसी ताकत के बेस पर आज राश्टीय बालिका दिवस बनाया जाता है।वो बेटियां जो कभी अपनी पहचान नहीं बना सकती लेकिन अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर सकती है।घरों में काम करने वाली बेटियां जो कभी अपनी आजादी की जिन्दगी नहीं जी सकती।अपने की घरों में षोशण का षिकार होती बेटिया घर के एक कोने तक सीमित रह जाती है।बाहर की दुनियां देखने के पहले ही वह गोद में मार दी जाती है।ऐंसे में समाज बेटियों को एक ही तर्ज पर सुरक्षित करने का काम कर सकते हैं।जिससे आज बालिका दिवस पर कई बेटियों को उनके अधिकार और उनकी सुरक्षा की जानकारी दी गयी।भीख नषा और दैहिक षोशण से वह हमेषा दूर रहें जिससे वह भारत की पहली प्रधानमंत्री इन्द्ररा गांधी की तरह सर्वव्यापी कुर्सेी पर विराजमान रह कर देष में अपना नाम रोषन कर सके।इसी बीच बेटियों ने अपनी असुरक्षा के बारे में जिक्र किया और उनसे लड़ने का फैसला लिया समस्त लड़कियों ने देषभक्ति गीत गाकर सबके मन को लुभाया और संकल्प लिया की वह हर हाल में षिक्षा और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ेंगी,चाहे उसके लिए समाज से ही क्यों ना लड़ना पडे़।जवाहर नगर,गफूर बस्ती, आदि जगह की बेटियों ने बाल चैपाल के जरिये राश्टीय बालिका दिवस मनाया मेरी टीम सदस्य,दीपिका रातैला और बहनों ने यह कार्यक्रम बेटियों को जागरूक करने हेतु कराया बेटी जिन्दाबाद।के नारों से षहर गुंज गया।


लावारिस मुसलिम बुजुर्ग जिस दिषा में जाऊं वही दीन दुखियारी,मन परेषान हो जाता है। खुद का दर्द खत्म होता नहीं कि फिर किसी के दुखों का आवाज आने लगती है।हाथ पैर स्वंय ही उसकी सेवा के लिए उठने लगते हेंैं। पर्स में पेैसे हो ना हो लेकिन हौसला खत्म नहीं होता, ईष्वर की मदद मिल जाती है। रास्ते खुद ही खुलने लग जाते हैं। भूख प्यास परेषानी सारे जरूरी काम सब भूल जाती हूॅं। प्रयास रहता है कि किसी तरह इसकी जिन्दगी बचा कर इसकी सेवा करू,यही सोचकर हल्द्वानी के बनभूलपुरा से नाली के किनारे पड़े सलीम खान को उठाया,काफी बुजुर्ग और बीमार इंसान गन्दी नाली के किनारे चोट के कारण तड़प रहा था। उसका मुहॅ पानी और भूख से सुख रहा था, एक पल के लिए लगा कि मेरा रास्ता वह लेकिन उसकी तड़पती हालत मुझसे देखी नहीं गयी।उसको वहां से उठाने के लिए हाथ बड़ने लगे आस-पास के लोगों ने काफी भीड़ लगा ली और उसकी सेवा के लिए कई हाथ उठ गये, कई लोग उसके आस-पास से गुजर रहे थे।लेकिन षायद ईष्वर चाहता था कि मैं वहां से गुजरूं तो दुसरा रास्ता बंद कर दिया,उस रास्ते मुझे भेज दिया जिस रास्ते सलीम खान तड़प रहा था। और मेरे साथ दो स्कूली छात्रायें और आस-पास के कई लोग षामिल हो गये और सब लोगों न मिलकर उसे 108 में रखा लेकिन जब एम्बूलैंस वाले ने बताया कि अस्पताल प्रषासन इनको भर्ती नहीं करेगा तो मुझे उनके साथ अस्पताल जाना पड़ा,वरना उसको कोई भर्ती नहीं करता। तीन दिन की सेवा के बाद सलीम खान ने दुनिया छोड़ दी वह बीमारी की वजह से सो नहीं पाता था। इलाज करने के बाद भी वह कमजोर हो गया और अचानक रात के समय दर्द भरे इस जिन्दगी से दुनिया को अलविदा कह दिया।दुसरे दिन पुलिस ने पंचनामा भरकर उसके षरीर को समाप्त करने का इंतजाम कर दिया।